डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि नेशनल मिशन फाॅर क्लीन गंगा को प्रशासनिक अधिकार दिये जायेंगे. यह मिशन जल संसाधन मंत्रालय के अधीन एक सोसाइटी के रूप में कार्य करता है. इसका प्रमुख कार्य नगरपालिकाओं को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए धन आवंटित करना है.
गंगा में प्रदूषित पानी डालनेवाली नगरपालिकाओं एवं उद्योगों के विरुद्ध मिशन स्वयं कोई कार्रवाई नहीं कर पाता था. मिशन के अधिकारियों को राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सूचना देनी होती थी. राज्य बोर्ड के अधिकारियों द्वारा स्थानीय पुलिस की मदद ली जाती थी. इस चक्रव्यूह में मिशन के हाथ बंध जाते थे. अब मिशन द्वारा गंगा में प्रदूषण फैलानेवाली इकाइयों पर सीधे कार्रवाई की जा सकेगी. सरकार के द्वारा वर्तमान में उठाये जा रहे कदमों को बल मिलेगा.
बीएचयू के प्रोफेसर पीके मिश्रा के अनुसार क्षेत्र के उद्योग अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. प्लांट को डिजाइन करने के लिए उनसे संपर्क कर रहे हैं. हां, कुछ चालाकी बरत रहे हैं.
जैसे भदोही के किसी उद्यमी द्वारा गंदे पानी को नाले में बहाने के बजाय बोरवेल खोद कर उसे जमीन में डाला जा रहा है. इस प्रकार की गड़बड़ी दर्शाती है कि उद्योगों पर सरकार का दबाव है. सरकार द्वारा शहरी निकायों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए भारी रकम उपलब्ध करायी जा रही है. मौजूदा सरकार के इस प्रयास का रिजल्ट भले देर से आये, पर आयेगा जरूर.
नदी की स्वच्छता के लिए इसमें मछली का होना जरूरी है. मछली इस बात का प्रमाण है कि पानी में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध है. यूपीए सरकार ने सात आइआइटी के समूह को गंगा बेसिन के मैनेजमेंट का प्लान बनाने को दिया था. समूह ने निर्णय दिया कि गंगा की पूर्णता को बनाये रखने के लिए लगभग 52 प्रतिशत पानी नदी में छोड़ा जाना चाहिए और शेष 48 प्रतिशत पानी का उपयोग सिंचाई एवं बिजली बनाने के लिए हो सकता है.
यह रपट यूपीए सरकार के कार्यकाल की संध्या में प्रस्तुत की गयी थी, इसलिए यह कहना कठिन है कि यूपीए सरकार द्वारा इसे लागू किया जाता या नहीं. बहरहाल, वर्तमान में नदी में पानी की मात्रा न्यून है. पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बिजली कंपनियों को दी जा रही स्वीकृति में 52 प्रतिशत प्रवाह छोड़ने की शर्त नहीं लगायी जा रही है. पहले बनी परियोजनाओं द्वारा वर्तमान में मात्र एक प्रतिशत पानी छोड़ा जा रहा है. पिछले दो वर्षों से एनडीए सरकार ने ज्यादा पानी छोड़ने की पहल नहीं की है.
नदी का निरंतर प्रवाह बनाये रखना भी जरूरी है. गंगा नदी के निचले क्षेत्र से हिलसा मछली अंडे देने के लिए बनारस एवं इलाहाबाद तक आती थी. अंडे बह कर वापस समुद्र में जाते थे.
वहां बड़े होकर बड़ी मछली अगले चक्र में ऊपर आती थी. फरक्का बराज बनने के बाद फरक्का के ऊपर हिलसा लुप्त हो चुकी है, चूंकि समुद्र से मछली अपने प्रजनन क्षेत्र को नहीं पहुंच रही है. इसी प्रकार उत्तराखंड में महासीर मछली की साइज छोटी होती जा रही है. इस समस्या से निबटने के लिए आइआइटी समूह ने सुझाव दिया था कि नदी के बहाव की निरंतरता को बनाये रखा जाये. एनडीए सरकार को इस सुझाव पर अमल करना चाहिए.
मछली के जीवन के लिए यह भी जरूरी है कि उसकी रिहाइश के बालू से छेड़छाड़ न की जाये. मछली, कछुए आदि प्रजातियां छिछले बालू में अंडे देती हैं. नदी के द्वारा अपनी प्रकृतिनुसार 3-4 साल के बाद जमा हुए बालू को बाढ़ में स्वतः समुद्र में पहुंचा दिया जाता है.
बाढ़ प्राकृतिक अवस्था है. इससे जलीय जंतुओं को हानि नहीं होती है. यूपीए सरकार ने गंगा पर नेशनल वाटरवे बनाने का प्रस्ताव बनाया था, परंतु कार्यान्वित नहीं किया था. अतएव गंगा की मछलियां एवं कछुए अपने बालू के घरों में सुरक्षित थे. एनडीए सरकार नेशनल वाटरवे को मूर्त रूप देना चाहती है. इस हेतु गंगा में ड्रेजिंग का कार्य चल रहा है. मछलियां अपने बसेरे से बेदखल हो रही हैं. देश के पर्यावरण कानून की स्वीकृति के बिना यह कार्य हो रहा है.
पूरा विश्व प्रयासरत है कि नदियों के कुछ हिस्से प्राकृतिक रूप में बरकरार रहें. अमेरिका में नदियों की कई साइटों को ‘वाइल्ड एवं सीनिक’ घोषित किया गया है. इनके किनारे पशु चराना भी वर्जित है. यूपीए सरकार ने भी उत्तर काशी के ऊपर के क्षेत्र को इको सेंसेटिव क्षेत्र घोषित किया था. पद संभालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भावुक होकर कहा था कि ‘अब हमें गंगा से कुछ लेना नहीं है, बस देना है.’ लेकिन, एनडीए सरकार द्वारा गंगा से बिजली, पानी एवं जहाजरानी लेने का ही प्रयास किया जा रहा है.
गंगा में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम सही दिशा में हैं. नेशनल मिशन फाॅर क्लीन गंगा को प्रशासनिक अधिकार देने का स्वागत है, परंतु ये कदम अपर्याप्त होंगे. गंगा का मूल गंगत्व उसके बहाव, वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं से उत्पन्न होता है. इन्हें पहले संरक्षित करना चाहिए. जल विद्युत, सिंचाई तथा जहाजरानी परियोजना से गंगा को मृत्यु के घाट उतार कर उसकी सफाई करने की क्या सार्थकता है?
