नियंत्रण रेखा से सटे उड़ी में भारतीय सेना पर आतंकी हमले के महज दो दिन बाद पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय चौकियों पर गोलीबारी की घटना अमन पसंद लोगों को हैरान कर सकती है. हैरानी इसलिए भी, क्योंकि उड़ी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और इस हमले का जवाब कैसे दिया जाये, इस पर भारत में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर चल रहा है. लेकिन, तारीख गवाह है कि भारत ने जब भी आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने की कोशिशें की हैं, पाकिस्तानी सेना बौखलाहट का परिचय देती रही है.
खासकर पिछले दो-तीन वर्षों से तो वह आतंकियों की घुसपैठ कराने, कश्मीर में अशांति फैलाने और भारतीय सैनिकों को उकसाने के मकसद से संघर्ष विराम का लगातार उल्लंघन कर रही है. पिछले साल ही अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 253, जबकि नियंत्रण रेखा पर 152 ऐसी घटनाएं हुईं. भारतीय सेना ने न केवल पाक सैनिकों की गोलीबारी का जवाब दिया, बल्कि उड़ी और नौगाम सेक्टर में नियंत्रण रेखा से घुसपैठ की दो बड़ी कोशिशों को नाकाम भी कर दिया. दरअसल, उड़ी हमले के बाद से भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज किये गये कूटनीतिक प्रयासों की काफी हद तक सफलता के चलते पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. एक दिन पहले भारत के पारंपरिक मित्र रूस ने पाकिस्तान के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास स्थगित करते हुए उसे हेलीकॉप्टर देने से भी मना कर दिया.
अगले ही दिन जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान का नाम लिये बिना कहा कि ‘जो भी देश छद्म युद्ध में लगे हैं, उन्हें इसे बंद करना होगा’. जर्मनी के विदेश मंत्री फ्रांक वॉल्टर श्टाइनमायर ने साफ कह दिया कि ‘जिन देशों में ये दहशतगर्द पनप रहे हैं, वे कैसे अपने आपको पाक साफ कह सकते हैं. इस धारणा का भी कोई मतलब नहीं है कि दो देशों के बीच तनाव का हवाला देकर आतंकवाद के जनक देशों के खिलाफ किसी तरह की पुख्ता कार्रवाई न की जाये.’ संकेत साफ हैं, उड़ी हमले के बाद कई प्रमुख देश भारत के समर्थन में खुल कर बोलने लगे हैं.
ऐसे में कश्मीर में खून-खराबे की अपनी साजिश के जाल में पाक खुद फंसने लगा है. अब पाक के नापाक मंसूबों पर पानी फेरने के लिए भारत को जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों को तेजतर बनाये रखना चाहिए, वहीं सीमा पर घुसपैठ रोकने और संघर्ष विराम उल्लंघन का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भी अधिक चौकस रहना चाहिए.
