निर्देशक इम्तियाज अली ने कुछ साल पहले एक फिल्म बनायी थी- लव आजकल. इसमें पुराने जमाने के प्यार करने के तौर- तरीकों और आज के जमाने के प्यार को दिखाया गया था.
पुराने जमाने के प्रेमियों का आदर्श देवदास था, जिसमें प्यार का मतलब था- त्याग. प्रेमिका या प्रेमी की शादी हो गयी, तो इस बात की कामना कि वह हमेशा खुश रहे. इस तरह का प्रेम अकसर प्लेटोनिक होता था. आम तौर पर किसी को देख कर ही उसे अपना मान लिया जाता था. देखने भर की तमन्ना होती थी, चिट्ठी-पत्री तो दूर की बात है. कुछ इस तरह- भरे भौन में करत हैं नैनन ही सौं बात…
अकसर लोककथाओं में ऐसी कहानियां मिलती हैं कि राजकुमार ने राजकुमारी का सुनहरा बाल पानी में बहता देख लिया, तो सोचा कि जिसके बाल इतने सुंदर हैं, वह खुद कितनी सुंदर होगी. कोई राजकुमारी किसी राजकुमार का चित्र देख लेती थी, या उसकी वीरता के कारनामे सुन लेती थी, तो उस पर मोहित हो जाती थी. पुराने जमाने के पुरुष के लिए वीरता और धीरता अनुपम गुण थे. प्रेमियों को मिलाने के लिए और एक बार प्रिय से मिलने के लिए तरह-तरह की जुगत भिड़ाई जाती थी. जायसी के पद्मावत में अलाउद्दीन खिलजी पदमावती की छाया भर देख कर उस पर मोहित हो जाता है, जबकि वह किसी और की पत्नी थी. मशहूर लेखिका मन्नू भंडारी ने लिखा भी है कि पहला प्यार भुलाये नहीं भूलता. उनकी इसी थीम की कहानी- ‘यही सच’ पर रजनीगंधा नाम से फिल्म भी बनी थी. बहुत से लोग (महिला और पुरुष दोनों ही) अपने प्यार के असफल होने पर आजीवन अविवाहित भी रह जाते थे.
हां कभी-कभी इस तरह के प्रेम-प्रसंग भी सुनाई देते थे कि तुम मुझे न चाहो तो कोई बात नहीं, पर किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी. कोई लड़का या कोई लड़की अपनी पसंद से भी शादी कर सकते हैं, अपना जीवन साथी भी चुन सकते हैं, इस धारणा को लोकप्रिय करने में हिंदी फिल्मों का ही हाथ है.
आज अगर इस प्यार के बारे में कहे, लिखे या फिल्म बनाये, तो शायद ही कोई इस पर यकीन करेगा. ऐसी किसी फिल्म को पकाऊ, बोरिंग और परदादा के जमाने की कहा जायेगा. आज प्यार भी सिर्फ टू मिनट नूडल की तरह है. आज हुआ, कल खत्म. प्यार में इमोशन और भावुकता भी हो सकती है, इसे कोई नहीं मानता. आखिर प्यार के लिए रोना-धोना, दुख कैसा. वह तो एंज्वॉय करने और खुशी मनाने की चीज है. जेनरेशन जेड के लिए पहला प्यार तो फेसबुक पर होता है. कुछ दिन चलता है, फिर खत्म हो जाता है. यही नहीं, प्यार दिखाने और गाने-बजाने की चीज है. यहां तक कि प्यार का टूटना भी सेलिब्रेट करने के लिए है. कई बार लोग फेसबुक पर अपनी झूठी फोटो लगा देते हैं. जो जिस अनाम अनदेखे-से प्यार कर रहा है, वह उसकी दादा-दादी की उम्र का है, यह भी पता नहीं चलता.
फिल्मों ने सिर्फ चित्र से प्यार करने को आगे बढ़ाया था. नायक-नायिका एक-दूसरे को देखते थे. गाते-बजाते थे. मिलते-बिछड़ते थे. खलनायक की एंट्री अलग से होती थी. और अंत में प्रेमिका जो फिल्म की हीरोइन होती थी, उसके लिए हीरो जान की बाजी लगा देता था, और खलनायक की हड्डी-पसली एक कर देता था. आज भी खलनायक होते हैं, मगर वे एके-47 से लैस होते हैं. वे बदला तो किसी और बात का लेने आते हैं, मगर बोनस में हीरोइन को पाना चाहते हैं. हीरोइन से प्रेम उनमें से पुराने खलनायकों की तरह शायद ही किसी को होता है. अब प्रेम बदल गया है, प्रेमी बदल गये हैं, तो खलनायक क्यों न बदले.
क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
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