पुरानी नीति है- ‘तावत् भयात् भेतव्यम यावत् भयम् अनागतम्.’ अर्थात् भय के कारण से तभी तक डरना चाहिए, जब तक वह आंखों के सामने न हो. अगर भय का कारण सामने आ जाये, तो ‘प्रतिकुर्यात् यथोचितम्’ यानी प्रतिकार में ही बुद्धिमानी है. मोटे तौर पर यह नीति प्रत्यक्ष संघर्ष को जहां तक हो सके टालने और कोई विकल्प न बचने पर जान लेने पर उतारु शत्रु पर पूरी ताकत के साथ टूट पड़ने की बात कहती है. लेकिन, उड़ी की भयावह आतंकी घटना के बाद भारत के लिए प्रतिकार का सही रास्ता क्या हो? इसके उत्तर तक पहुंचने के लिए यह समझना जरूरी है कि असल समस्या है क्या.
बेशक कश्मीर में किसी आतंकी घटना को पाकिस्तान, कश्मीरी अलगाववाद और इसलामी चरमपंथ से पूरी तरह अलग कर पाना मुश्किल है, तो भी उड़ी हमले की गंभीरता को समझने के लिए उसे कश्मीरियत का राग अलाप रही इसलामी चरमपंथी राजनीति और घाटी में हिंसा के नये दौर से तनिक अलग करके देखने की जरूरत है. तथ्य बताते हैं कि जिन्होंने आर्मी कैंप पर हमला किया, वे पाक द्वारा हथियाये कश्मीर के रास्ते भारत में घुसे, हमला नियंत्रण-रेखा के पास किया और निशाना बनाया सैन्य-शिविर को. यानी हमलावरों के सामने मकसद साफ था.
उन्हें कश्मीर में घुस कर स्थानीय आतंकियों या अलगाववादियों के साथ किसी दूरगामी योजना पर काम नहीं करना था, उनकी योजना थी कि भारतीय सैन्य-ठिकानों और सैनिकों को अधिकतम हानि पहुचे. जाहिर है, नियंत्रण रेखा के उस पार कोई ऐसा है जो अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहता, लेकिन उसकी लगातार कोशिश भारतीय राष्ट्र-राज्य को रक्तरंजित करने की है. अगर युद्ध का एक अर्थ है किसी देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाना, उसके धैर्य को ललकारना और सुरक्षा तैयारियों को तोड़ कर सैन्य-बल का आत्मबल कम करना, तो फिर उड़ी की घटना अपने स्वभाव में किसी युद्ध से कम नहीं है.
हालांकि, सीमा-पार से भारत को रक्तरंजित करते रहने की यह कोशिश 1947 से ही चल रही है, जब पाकिस्तान के कायदे-आजम जिन्ना ने अपना नाम छुपाये रख कर कश्मीर में खूंरेजी के लिए बनैले लश्कर भेजे थे.
आमने-सामने के दो और युद्धों में मिली हार से बौखलाये पाकिस्तान ने जनरल जियाउल हक के वक्त में छद्म-युद्ध की जिन्ना की इस रणनीति को स्थायी रूप दिया. जनरल मुशर्रफ के समय का करगिल युद्ध हो या उसके बाद अलग-अलग इलाकों में भारतीय सैन्य-ठिकानों पर हमले, पाकिस्तान ने नाम और चेहरा छुपा कर भारत को लगातार घाव देने की कोशिशें की हैं. तो असल समस्या पाकिस्तान प्रेरित छद्म-युद्ध की यही नीति है. मुश्किल यह भी है कि पड़ोसी देश चीन अपने निहित स्वार्थों के चलते पाकिस्तान की इस नीति को शह दे रहा है.
लेकिन, इस समस्या से निपटें कैसे, इस पर राजनीतिक बयानबाजियों और तथाकथित विशेषज्ञों के जोशीले सुझावों से कोई एक राह नहीं निकल रही. संकट के मौकों पर संयम में यकीन रखनेवाले कह रहे हैं कि कश्मीर में पाक प्रेरित आतंकवाद की यह पहली घटना नहीं है, इसलिए जरूरत आंतरिक सुरक्षा-तंत्र को ज्यादा-से-ज्यादा मजबूत करने और हरचंद चौकस रहने की है.
लेकिन, दूसरी राय यह है कि अब बहुत हुआ! हम शहादत से उपजे शोक को सीने में बहुत छुपाते आये, और बर्दाश्त करना मुश्किल है, सो अब वक्त है कि पाकिस्तान को जवाब दिया जाये. यानी यह वक्त शत्रु पर जबर्दस्त तरीके से हमलावर हो उठने का है.
जरा ठहर कर सोचें तो अपने स्वभाव में परस्पर विपरीत जान पड़ती इन दोनों प्रतिक्रियाओं से परे जाकर ही कश्मीर में जारी पाकिस्तान प्रेरित छद्म-युद्ध का कारगर निदान तलाशा जा सकता है.
प्रत्यक्ष युद्ध मोल लेने से पहले भारतीय सत्ता-प्रतिष्ठान को सोचना होगा कि पाकिस्तान की नीति नाम, चेहरा और ठिकाना छुपा कर भारत पर हमलावर होने की है. इसके प्रतिकार में भारत अगर हमलावर होता है, तो बड़ी चुनौती यह होगी कि वह किसे दोषी ठहराये और किन ठिकानों पर हमला करे. परदे के पीछे छिपी पाक सेना, खुफिया एजेंसी और चरमपंथियों पर सीधे-सीधे हमलावर होने में जहां रणनीतिक दिक्कते हैं, वहीं कूटनीतिक भी. इसलिए पाक कितना भी उकसाये, युद्ध में उतरने जैसा फैसला लेने से पहले हमें सौ दफे सोचना होगा कि कूटनीति की लड़ाइयां कूटनीति के मैदान में ही लड़ी जाती हैं, उनका कोई युद्धक्षेत्र नहीं होता.
ऐसे में दुश्मन के हाथों बार-बार घाव खाते रहने की स्थिति से उबरने के लिए अब सोचा यह जाना चाहिए कि हमलावरों को जिन स्रोतों से हथियार और धन मिल रहा है, उसकी जड़ें काटने के लिए किस तरह का मिशन शुरू किया जाये. संकट की इस घड़ी में अपने अंदर की चुनौतियों को पहचानना भी जरूरी है.
गंभीरता से सोचना होगा कि जम्मू-कश्मीर से लगती नियंत्रण-रेखा के आसपास के क्षेत्र को कैसे इतना सुरक्षित बना दिया जाये कि दुश्मनी का भाव रखनेवाला कोई व्यक्ति वहां अपने कदम रखने से पहले सौ दफे सोचे. कैसे सुरक्षा बलों को ऐसे हमलों से निपटने के लिए आधुनिक साजो-सामान और निगरानी उपकरणों से लैश किया जाये? साथ ही अहम चुनौती यह भी है कि राष्ट्रीय शोक और संकट के ऐसे नाजुक मौकों पर हम राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों को परे रख कर एक राष्ट्र के रूप में कैसे एकजुट नजर आयें? इन चुनौतियों से पार पाकर ही प्रतिकार की हमारी ताकत बढ़ेगी.
