जम्मू-कश्मीर के उरी क्षेत्र में सैन्य ठिकाने पर हुए आतंकी हमले से पाकिस्तान के खतरनाक इरादे एक बार फिर जाहिर हुए हैं. रविवार तड़के हुए इस हमले में हमारे 17 सैनिक शहीद हुए हैं और अनेक घायल हैं. बारहवीं ब्रिगेड का यह मुख्यालय नियंत्रण रेखा के समीप है. इस हमले को अंजाम देनेवाले पाकिस्तान से आये चार आतंकियों को मार दिया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए देश को भरोसा दिलाया है कि इस हमले में शामिल दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा़ हालात पर नजर रखने के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अमेरिका और रूस का अपना दौरा स्थगित कर दिया है तथा रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और सेनाध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग घटनास्थल की ओर रवाना हो रहे हैं. इस घटनाक्रम से उम्मीद बंधी है कि पाकिस्तान द्वारा राज्य में कराये जा रहे घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों के विरुद्ध समुचित कदम तुरंत उठाये जायेंगे.
विपक्षी दलों ने घटना पर कड़ा रोष प्रकट करते हुए सरकार को पूरा समर्थन देने की घोषणा की है. यह एक अच्छा संकेत है. ऐसी घुसपैठों पर अंकुश लगाने के लिए जो भी करना उचित हो, किया जाना चाहिए. देश की सुरक्षा से संबंधित मसलों में कार्रवाई करने में देरी घातक है. इस साल सीमा पार से घुसपैठ की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. इस वर्ष जून तक ऐसे 90 मामले सामने आये हैं, जबकि इसी अवधि में पिछले साल 29 घटनाएं ही हुई थीं.
घुसपैठी आतंकियों द्वारा सेना पर हमले के मामले भी बढ़े हैं. इसी महीने पुंछ में हुए हमले में दो जवान, तीन पुलिसकर्मी और एक नागरिक मारे गये थे़ नौ सितंबर को पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के शिविर पर हमला हुआ था. इस इलाके में इससे पहले भी दो घटनाएं हुई थीं. 15 अगस्त के तीन दिनों के भीतर ख्वाजा बाग और नवहट्टा में हमले हुए. कुपवाड़ा में जुलाई के महीने में घुसपैठियों के साथ मुठभेड़ हुआ. जून में अनंतनाग में पुलिस को निशाना बनाया गया. जनवरी में पठानकोट में वायु सेना के ठिकाने पर फिदायीन हमला हुआ. इन सभी घटनाओं में मारे गये आतंकियों की पहचान और अन्य सबूतों से पता चलता है कि सारे हमलावर सीमा पार से आये थे.
इन गतिविधियों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह बनाना होगा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत-विरोधी छद्म युद्ध को बेनकाब करने की जरूरत है. आतंकियों को शह देने तथा कश्मीर में अलगाववाद भड़काने में उसकी भूमिका के कारण कश्मीर में अमन-चैन बहाल करने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. इस संदर्भ में तात्कालिक तौर पर ठोस रणनीतिक पहल बहुत जरूरी है. इस पूरे परिदृश्य में हमें अपनी खामियों की पड़ताल करने की आवश्यकता है.
रिपोर्टों की मानें, तो ऐसे हमले के बारे में पहले ही खुफिया सूचनाएं मिल चुकी थीं. उरी के पूर्व ब्रिगेड कमांडर एसए हसनैन ने बताया है कि उन्होंने स्वयं दस दिन पहले वर्तमान कमांडर को फिदायीन हमले की आशंका से अवगत करा दिया था. ऐसे में पूर्व सूचना के बाद भी चौकसी में कमी चिंताजनक है.
हालांकि इस तरह के हमलों का पहले ठोस अनुमान लगा पाना दुष्कर है, पर खुफिया तंत्र को मुस्तैदी से अपना काम करना चाहिए. सैन्य ठिकानों और सुरक्षा बलों के शिविरों की पर्याप्त सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. विशेषज्ञों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि आतंकियों ने अपनी रणनीति में बदलाव किये हैं. पहले वे घुसपैठ करने के बाद कुछ समय भीतरी क्षेत्रों में पड़े रहते थे और बाद में घात लगा कर हमला करते थे.
लेकिन उरी में उन्होंने घुसपैठ के तुरंत बाद ही हमला किया है. इस बात के पूरे संकेत हैं कि ऐसी वारदातों से पाकिस्तान घाटी की अशांति को और भड़काना चाहता है. जाड़े के मौसम से पहले ज्यादा से ज्यादा घुसपैठिये भेज कर पाकिस्तान और उसकी गोद में बैठे आतंकी सरगना यह चाहते हैं कि उस मौसम में भी घाटी में अमन न रहे. जुलाई से कश्मीर में व्याप्त हिंसा की स्थिति को सामान्य बनाने की हमारी कोशिशें असफल रही हैं. कश्मीर की जनता के साथ संवाद स्थापित करने में भी विफलता ही हाथ लगी है.
अब तक 87 लोगों की मौत हो चुकी है और घायलों की संख्या हजारों में है. पाकिस्तान तो यही चाहता है कि हिंसा का दौर जारी रहे, ताकि वह दुनिया के सामने अपनी हरकतों को जायज ठहरा सके. उसके इस मंसूबे को नाकाम करने के लिए घाटी के लोगों को भरोसे में लिया जाये. इसके लिए बातचीत की प्रक्रिया लगातार जारी रखनी होगी तथा क्रुद्ध प्रदर्शनकारियों से नरमी का बरताव करना होगा. इस प्रयास में जो निराशाजनक रवैया अपनाया गया है, उसे सुधारने की जरूरत है.
और, घुसपैठ रोकने तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश में उस रवैये के दुहराव की गलती से भी बचना होगा. कश्मीर में अमन-चैन की बहाली और सीमाओं की सुरक्षा चाक-चौबंद करना तथा पाकिस्तान को उसके आक्रामक रवैये के लिए जवाबदेह बनाना ही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है.
