नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने भारत दौरे से पहले कहा है कि इससे दोनों देशों के आपसी संबंधों को मजबूती मिलेगी तथा उन्हें और नेपाल की जनता को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूरा भरोसा है. वे तीन दिवसीय यात्रा पर 15 सितंबर को नयी दिल्ली पहुंचेंगे. यह परंपरा रही है कि नेपाली प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का पहला पड़ाव भारत होता है.
प्रचंड इस परिपाटी में एक और अध्याय जोड़ेंगे़ यह भी उल्लेखनीय है कि जब 2008 में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने इस परंपरा से अलग अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में चीन को चुना था. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि बीते एक साल में भारत-नेपाल संबंध ठीक नहीं रहे हैं और उनकी प्राथमिकता परस्पर विश्वास का आधार तैयार करना है. पिछले साल नये संविधान में मधेसी और जनजातीय समुदाय के हितों की अनदेखी के बाद नेपाल में उभरे भारी असंतोष और हिंसा के परिवेश में दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गये थे. भारत ने इस पड़ोसी देश की स्थिरता और समृद्धि में साथ देने की अपनी नीति के अनुरूप हमेशा सहयोग का हाथ बढ़ाया है.
उम्मीद है कि प्रचंड के इस रुख के बाद तल्खी का माहौल बदल सकेगा और भारत भी पहले की तरह सकारात्मक रवैया अपनाते हुए प्रचंड की नयी सरकार के प्रति मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए गंभीरता से प्रयासरत होगा. लेकिन इस प्रक्रिया में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. नेपाल की आंतरिक राजनीति में शांति वहां की सरकार और संसद द्वारा मधेस और जनजातीय समुदायों को किये गये वादों को अमल में लाने के प्रयासों पर निर्भर है.
भारत के साथ संबंधों के मामले में नेपाल और चीन के आपसी रिश्तों के समीकरण भी खासा मतलब रखते हैं. रिपोर्टों के अनुसार, अक्तूबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का प्रस्तावित नेपाल दौरा कुछ आपसी नाराजगी के कारण रद्द हो गया है. बहरहाल, पिछले महीने मोदी द्वारा दिये गये आमंत्रण को स्वीकार कर भारत आने का प्रचंड का निर्णय स्वागतयोग्य है. दक्षिण एशिया में अस्थिरता और आतंकवाद की चुनौतियों का सामना करने तथा क्षेत्रीय आर्थिक विकास के लिए भारत-नेपाल संबंधों की मजबूती जरूरी है.
