आज सभी धर्मों के बुद्धिजीवी अपनी धर्म संस्कृति की पहचान बनाये रखने के लिए चिंतित नजर आते हैं. पृथक पहचान बनाये रखने का सिद्धांत एक प्रतिक्रियावादी सिद्धांत है, जो मानव-समाज की एकता में बाधक है़ वह इसलिए क्योंकि यह सिद्धांत संस्कृति के उन तत्वों, उन विभिन्नताओं को बनाये रखने पर जोर देता है, जो उसे दूसरे से अलग करते हैं.
विभिन्न संस्कृतियों के बीच अलगाव एवं संघर्ष इसी सिद्धांत की देन है. आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि सभी समाज एवं संस्कृतियां एक-दूसरे के निकट आकर परस्पर घुलें-मिलें और जिन संस्कृतियों मे उत्तम, उदात्त, मानव-एकता के हितकर चीजें हों, उन्हें वे खुले हृदय से अपनाएं. इससे विभिन्न संस्कृतियों का परिष्कार होगा तथा एक सुंदर एवं स्वस्थ मानवतावादी संस्कृति का निर्माण होगा. विश्व स्तर पर मानवजाति पर खतरनाक रूप से मंडराती सभ्यताओं के संघर्ष को इसी विधि से टाला अथवा समाप्त किया जा सकता है, अन्यथा स्थिति भयावह है.
नवीन चंद्र प्रसाद, गुमला
