दो अक्तूबर गांधी जयंती पर एक और नयी पार्टी बनने की घोषणा हो चुकी है. वैसे तो देश में पहले ही बहुत पार्टियां हैं, मगर अन्ना आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी से जनता की आशाएं जल्द ही धूमिल होने लगी हैं इसलिए अन्य कई कारणों से ही ये हालात बने हैं.
इस नयी पार्टी पर जनता का कितना विश्वास होगा, अभी कहना कठिन है क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है. जब आम आदमी पार्टी से ही भरोसा उठ गया हो, तो किसी नयी पार्टी पर यह कैसे हो पायेगा? इनसान से प्रायः गलतियां होती हैं. केजरीवाल अपनी गलतियों पर प्रायश्चित करने, टकराव और असभ्य भाषा को त्यागने, मर्यादा और संविधान का पालन करने और ठोस जनवादी कार्यों से ही अब फिर से इसमें जान डाल सकते हैं. मगर ऐसा संभव नहीं लगता. पार्टी अच्छे, सच्चे, त्यागी और ईमानदार लोगों से ही मजबूत होती है.
वेद मामूरपुर, दिल्ली
