डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
‘जतरा’ आदिवासियों के जीवन का सांस्कृतिक पक्ष है. यह नृत्य की शैली है. त्योहार भी है. इस अवसर पर मेले का आयोजन होता है. स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे सब एक जगह अखड़ा में एकत्रित होकर मांदल-नगाड़े की थाप पर नृत्य और गीतों से सराबोर हो जाते हैं. ऐसे अवसर आदिवासियों की लोकतांत्रिकता के उदाहरण हैं. जीवन के प्रति उल्लास का यह भाव अन्यत्र दुर्लभ है.
हमारे देश में आदिवासी समुदाय विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग अवस्थित हैं. फिर भी सभी आदिवासी समुदायों में जतरा की प्रवृत्ति लगभग समान है. समान सांस्कृतिक बुनावट के बावजूद आदिवासी समुदाय एक केंद्रीय मंच पर अब तक नहीं आ सके हैं. इस दिशा में बेहतर प्रयास की जरूरत है. इसी के तहत ‘अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच’ ने साहित्य अकादमी के सहयोग से पिछले दिनों 27-28 अगस्त को रांची में ‘आदिवासी साहित्यिक जतरा’ का आयोजन किया था.
अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच का गठन साल 2002 में हुआ था. इसके संस्थापक-अध्यक्ष डॉ रामदयाल मुंडा थे. इसकी स्थापना में रमणिका गुप्ता की महती भूमिका है.
कम समय में ही इस संगठन ने देशभर के विभिन्न आदिवासी समुदायों की साहित्यिकता को उनकी मातृभाषा के साथ परिदृश्य में लाने का सराहनीय काम किया है. साहित्यिक जतरा की समन्वयक युवा साहित्यकार नीतिशा खलखो कहती हैं- ‘आदिवासी रचनाकारों में अभिव्यक्ति की बेचैनी है. वे खुद को दूसरों और अपनों के बीच अभिव्यक्त करना चाहते हैं. आदिवासी साहित्यकार अपनी अस्मिता के साथ वर्चस्वकारी शक्तियों के विरुद्ध संघर्षरत हैं. हमारा प्रयास है कि इसके लिए मंच तैयार हो.’
यह देखा गया है कि कथित मुख्यधारा की दुनिया आदिवासियों की रचनात्मकता के बारे में अनभिज्ञ है. वहां आदिवासियों की रचनात्मकता के बारे में कई गलतफहमियां भी हैं. आदिवासी समाज शुरू से ही रचनात्मक रहा है. उनकी साहित्यिक थाती उनके पुरखा साहित्य में देखने को मिलती है. यह पुरखा साहित्य बहुत कम मात्रा में बाहर की दुनिया में पढ़ा गया है.
आज जब आदिवासी समाज खुद लिखने की परंपरा से जुड़ गया है, तो लेखन के माध्यम से उसकी साहित्यिकता का स्वाभाविक विस्तार हो रहा है. इसी विस्तार को आदिवासी साहित्यिक मंच दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है. चूंकि आदिवासियों की अपनी-अपनी मातृभाषा है. उन भाषाओं का अपना ऐतिहासिक संदर्भ है, जिससे उनकी पहचान जुड़ी हुई है. ऐसे में उन भाषाओं की उपेक्षा का मतलब है अपनी पहचान की जड़ों को काटना. अतः आदिवासी साहित्यिक मंच मातृभाषाओं के साथ उनकी रचनात्मकता को आमंत्रित करता है. आदिवासी साहित्य विमर्श का यह पक्ष इसे अन्य साहित्यिक विमर्शों से विशिष्ट बनाता है. आज आदिवासी रचनाकार कम-से-कम एक साथ दो भाषाओं में खुद को अभिव्यक्त कर रहा है. प्राथमिक स्तर पर वह अपनी मातृभाषा से जुड़ रहा है और द्वितीयक स्तर पर अंगरेजी और हिंदी में लेखन कर रहा है. आदिवासी साहित्य विमर्श इसी रूप में खुद को स्थापित कर सका, तो यह भाषा की औपनिवेशिक संरचना से लड़ने का अनुकरणीय प्रयोग होगा.
रांची में आयोजित इस साहित्यिक जतरा में देश के विभिन्न कोनों से आदिवासी साहित्यकार शामिल हुए. नागा, खासी, भिल्लौरी, गोंडी, असुरी, एरुकला, बिरजिया, हो, संताली, खड़िया, नागपुरिया, मुंडारी, कुडुख, भूमिज इत्यादि भाषाओं के वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकार मौजूद थे.
इस जतरा में कविता, कहानी, आत्मकथा, गीत इत्यादि का समायोजन था. अलग-अलग प्रदेश और भाषाओं में रचना होने के बावजूद विषयवस्तु में अद्भुत समानता थी. इस समानता की वजह क्या हो सकती है? मेघालय के कवि पॉल लिंगदोह की कविता की कुछ पंक्ति इस तरह है- ‘इन पहाड़ों का भी है/ अपना सौंदर्य बोध’. संभवत: यही इस सवाल का जवाब भी है. अब विमर्श के माध्यम से यह बात सामने आ रही है कि आदिवासियों की दार्शनिक मान्यताएं एक हैं. प्रकृति के साथ सहजीविता उनके दर्शन का मूल भाव है.
इसी दार्शनिक पक्ष का महत्वपूर्ण स्वर है जल, जंगल और जमीन. इसकी बेचैनी पूर्वोत्तर की रचनाओं में भी उसी रूप में दिखती है, जैसे झारखंड और महाराष्ट्र की रचनाओं में है. भले ही संविधान निर्माताओं ने एक ही दार्शनिक मान्यता वालों को दो अलग-अलग अनुसूचियों में विभाजित कर दिया हो, पर वे भारत में समान रूप से वंचना के शिकार रहे हैं. उन्हें मनुष्यता के दर्जे से ही पदच्युत कर दिया गया था. आज यदि मध्य भारत के आदिवासी रचनाकार के यहां ब्राह्मणवादी मानसिकता के विरुद्ध प्रतिकार का भाव है, तो पूर्वोत्तर के आदिवासी रचनाकार के यहां भारत में अपने अस्तित्व को लेकर बेचैनी है.
आज समूचा आदिवासी समाज नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रतिपक्ष में खड़ा है. कितनी विडंबना है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची का प्रावधान आदिवासी क्षेत्रों के लिए किया गया और आज यही क्षेत्र अपने ही देश की सेना द्वारा भयंकर सैन्य दमन से गुजर रहे हैं. एक को आंतरिक सुरक्षा का खतरा बताया गया है, तो दूसरे के ऊपर अाफ्स्पा थोपा गया है. आज के आदिवासी साहित्य में इन सभी परिस्थितियों की सहज अभिव्यक्ति है.
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति ही व्यापक धरातल पर आदिवासी समाज की चुनौतियों का सामना कर सकती है. आज आदिवासी समाज की जो संकटग्रस्त स्थिति है, उस स्थिति में ऐसे आयोजन उम्मीद की किरण हैं.
आदिवासी समाज को खुद सांस्कृतिक एकजुटता की दिशा में सक्रिय प्रयास करना होगा. कला, साहित्य, दर्शन, इतिहास, सिनेमा इत्यादि के क्षेत्र में खुद को अभिव्यक्त करना होगा. इसके लिए रांची और दिल्ली से बाहर निकल कर अपना विस्तार करने की जरूरत है. इस तरह एक बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है, जो संस्कृतिविहीन राजनीति का विकल्प भी हो सकता है.
‘जतरा’ में युवक-युवतियों की खास भूमिका होती है. मांदल और नगाड़े की डोर उन्हीं के कंधों पर होती है. इसको भी ध्यान में रखते हुए कि ‘जतरा’ में सभी विचारों के लोगों का समन्वय होता है, उम्मीद है जतरा के अगले संस्करण में युवा नेतृत्वकर्ता बृहद रूप में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का मंच तैयार करेंगे.
