पहले खर्च करें, फिर मांगें पैसा

14वें वित्त आयोग की टीम झारखंड राज्य का दौरा पूरा कर उन संभावनाओं को तलाशने में लगी है, जो राज्य की बेहतरी के लिए लाजिमी हैं. आयोग आनेवाले दिनों में झारखंड की जरूरतों को पूरा कर व उसकी योजनाओं को अच्छी तरह से क्रियान्वित करा कर विकास की गति तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा. […]

14वें वित्त आयोग की टीम झारखंड राज्य का दौरा पूरा कर उन संभावनाओं को तलाशने में लगी है, जो राज्य की बेहतरी के लिए लाजिमी हैं. आयोग आनेवाले दिनों में झारखंड की जरूरतों को पूरा कर व उसकी योजनाओं को अच्छी तरह से क्रियान्वित करा कर विकास की गति तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा. सरकार ने 1.42 लाख करोड़ रुपये की मांग की है. लेकिन हम केंद्र सरकार से मिलनेवाली राशि का पूरा उपयोग करने में अब तक नाकाम रहे हैं. यही वजह है कि हर साल केंद्र सरकार से मिलनेवाली राशि का एक बड़ा हिस्सा सरेंडर हो जाता है, जो बढ़कर आज 12 हजार करोड़ रुपये हो गया है.

यह राशि झारखंड की बदहाली को बेहतरी में तब्दील करने की क्षमता रखती है. कहने को तो झारखंड में प्रचुर मात्र में खनिज व प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं. यहां कोयला से लेकर यूरेनियम तक मिलता है. यहां के कोयले से बड़े शहरों को ऊर्जा मिलती है, लेकिन राज्य का एक बड़ा हिस्सा जो गांव में रहता है वह अंधेरे में जीने को विवश है. एक बड़ी आबादी को दो शाम भोजन भी मयस्सर नहीं. राज्य के 24 में 20 जिले उग्रवाद की चपेट में हैं. बुनियादी जरूरतें पहुंच से दूर हैं.

दूसरी ओर, राज्य के मंत्री और सामाजिक सरोकारों से जुड़ने का ढोंग करनेवाले प्रतिनिधि अपने ऐशो-आराम में मशगूल होकर जनता के सुनहरे भविष्य के सपनों को रौंद रहे हैं. इसलिए झारखंड एक विरोधाभास के साथ जी रहा है कि इसकी कोख में अमीरी है और आंचल में गरीबी. इस राज्य के नेतृत्व करनेवालों के पास न तो विजन है न ही मिशन है. उनके पास कोई चीज है तो सिर्फ उनका पर्सनल एंबीशन (निजी महत्वाकांक्षा). क्या ऐसे ही चलेगा राज्य?

प्रो शैलेंद्र मिश्र, ओरमांझी, रांची

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