जरा सोचें कि ‘अराजकतावादी’ कौन!

।। रवीश कुमार ।। (वरिष्ठ पत्रकार) फिर से वही पुरानी दलीलें लौट आयी हैं. लोकपाल को लेकर दिल्ली में हुए अन्ना-अरविंद आंदोलन के वक्त भी क्या वही बातें मीडिया में मुखर नहीं थीं, जो इस बार फिर से हैं. अरविंद के आंदोलन को तब भी लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली के लिए खतरनाक बताया था और […]

।। रवीश कुमार ।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

फिर से वही पुरानी दलीलें लौट आयी हैं. लोकपाल को लेकर दिल्ली में हुए अन्ना-अरविंद आंदोलन के वक्त भी क्या वही बातें मीडिया में मुखर नहीं थीं, जो इस बार फिर से हैं. अरविंद के आंदोलन को तब भी लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली के लिए खतरनाक बताया था और अब भी. तब किरण बेदी अन्ना की तरफ से ऐसे आरोपों की धज्जियां उड़ाती थीं, आज वे उन्हीं बातों को लेकर अरविंद पर आरोप लगा रही हैं. दिल्ली में रेल भवन के बाहर मैदान में बैठी अरविंद मंत्रिमंडल को लेकर दी जा रही बहुपक्षीय दलीलों के बीच कोई एक मत बना पाना मुश्किल है. मुङो नहीं मालूम कि इससे पहले संसद के घेराव का नारा देनेवाली राजनीतिक पार्टियां अराजकतावादी थीं या नहीं, लेकिन यह तोहमत मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने पर बैठने के संदर्भ में लग रहा है.

आरोप लगानेवालों को ठीक से नहीं मालूम कि ‘अराजकतावादी’ होना क्या होता है, पर सारे सवाल इस शब्द का सहारा लेकर दागे जा रहे हैं. इससे पहले भी कई मुख्यमंत्रियों ने केंद्र के खिलाफ धरना दिया है, संसद परिसर के बाहर तमाम दलों के सांसद आये दिन धरना देते रहते हैं. क्या वे अराजकतावादी हैं? इतना जरूर है कि वे तमाम धरने अपनी प्रकृति में सांकेतिक थे, पर केजरीवाल ने उन सांकेतिक धरनों को शांतिपूर्ण-आक्रामक रूप देकर एक नयी बहस पैदा कर दी है कि क्या किसी मुख्यमंत्री को सचिवालय छोड़ कर धरने पर बैठना चाहिए? वह कार्यकर्ता है या मुख्यमंत्री? मानो मुख्यमंत्री होते ही किसी व्यक्ति की राजनीतिक पहचान स्थगित हो जाती है और वह मुख्य सचिव की तरह उसी नौकरशाही में समायोजित हो जाता है, जिसने कब ऐसे उलूल-जुलूल नियमों की परंपरा बना दी किसी को पता ही नहीं चला! मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी जब सीबीआइ जैसी संस्था को ललकारते हैं, तब उनसे क्यों नहीं पूछा जाता कि आप जिस देश के प्रधानमंत्री बननेवाले हैं, उसकी किसी संस्था को ऐसे क्यों ललकारते हैं? उनसे क्यों नहीं पूछा जाता कि जब वे कहते हैं कि ‘कमेटी नहीं कमिटमेंट चाहिए’ तो क्या वे कमेटी की लोकतांत्रिक जरूरत को खारिज करते हैं? किसी मसले पर जब कमेटी बनती है, तो उसमें कई लोग शामिल किये जाते हैं, ताकि सभी पहलुओं पर विचार हो सके. लोकसभा के पटल पर नोटों का बंडल पलट कर किसकी गरिमा रखी गयी, इस पर बहस होती है. और फिर बात नरेंद्र मोदी की नहीं, उन सभी मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों की है जो ऐसा करते रहे हैं. क्या वे सभी ‘अराजकतावादी’ हैं? आपातकाल लानेवाले क्या ‘अराजकतावादी’ नहीं थे?

अब आते हैं कि दिल्ली में मुद्दा क्या है? दक्षिण अफ्रीका की नागरिक कुछ लड़कियों की कथित रूप से किसी ड्रग्स रैकेट में शामिल होने की शिकायत लेकर कानून मंत्री थाने जाता है और पुलिस से कदम उठाने को कहता है. मंत्री पर आरोप है कि उन्होंने या उनके समर्थकों ने उन महिलाओं पर नस्लभेदी टिप्पणी की. एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक उन महिलाओं को भीड़ ने घेरे रखा और उन्हें लोगों के बीच ही पेशाब करने के लिए मजबूर किया. मंत्री पर यह आरोप बेहद गंभीर है. लेकिन आरोप लगानेवाली पुलिस से पूछा जाना चाहिए कि जब कानून मंत्री शिकायत लेकर आये थे, तब क्या पुलिस ने यह नहीं देखा कि उनके बीच एक विदेशी महिला घिरी है, जिसे भीड़ से निकाल कर सुरक्षा दी जानी चाहिए. पुलिस ने किसके भरोसे महिला को भीड़ के सहारे छोड़ दिया? कौन सा कानून एक महिला को सुरक्षा देने से दिल्ली पुलिस को रोक रहा था? अरविंद कहते हैं कि मौके पर कई कैमरे थे, आप कोई तसवीर दिखाइये जिसमें लोग महिलाओं को घेरे हुए हैं. क्या आपको लगता है कि भीड़ किसी महिला को तंग कर रही हो और मीडिया ऐसे प्रसंग की वीडियो नहीं बनायेगा! इसलिए इस बारे में राय बनाने से पहले न्यायिक जांच की रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए.

रहा सवाल धरना देने और दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के बीच संबंध का, तो इसे खारिज करनेवालों को निर्भया मामले के समय हुए आंदोलन को भी खारिज करना होगा. क्या यह सवाल ही अपने आप में अराजकतावादी नहीं है कि ‘बात-बात पर धरना देने से क्या होता है?’ क्या यही सवाल उन लाखों अस्थायी शिक्षकों और कर्मचारियों से भी करना चाहिए जो अपने मामूली हकों के लिए धरने देते हैं और लाठियां खाते हैं? धरना देने के खिलाफ बोलनेवाले लोकतांत्रिक कैसे हो गये?

एक मुख्यमंत्री उस पुलिस के खिलाफ धरना क्यों नहीं दे सकता जो उसके नहीं, किसी और के मातहत है? सीबीआइ पर किसी मुख्यमंत्री को विश्वास नहीं होता, तो दिल्ली का मुख्यमंत्री दिल्ली पुलिस पर कैसे भरोसा कर ले, जो केंद्र सरकार के गृह मंत्रलय के अधीन है? आखिर मुख्यमंत्री के कहने पर भी किसी थानेदार तक को गृहमंत्री निलंबित नहीं करते हैं, तो क्या वे मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद का अनादर नहीं कर रहे? हालांकि दूसरी तरफ सवाल यह भी है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी तरफ से कानून मंत्री को ‘क्लिन चिट’ देकर कानून अपने हाथ में नहीं ले रहे हैं? अगर कानून मंत्री ने विपक्ष के नेता अरुण जेटली पर शर्मनाक टिप्पणी की है, तो क्या कानून मंत्री को माफी नहीं मांगनी चाहिए और क्या केजरीवाल को सफाई नहीं देनी चाहिए?

रही बात धरना देने के समय और बारंबरता की, तो यह एक अलग सवाल है. गणतंत्र दिवस को देखते हुए केजरीवाल और उनके समर्थकों को संयम बरतना चाहिए. गणतंत्र दिवस की झांकियों और शक्ति-प्रदर्शन की औपनिवेशिक सोच को लेकर पहले भी कई लोग सवाल उठाते रहे हैं, मगर इसे रोकने का यह तरीका नहीं है. विदेशी मेहमानों को न्योता जा चुका है. कोई मुख्यमंत्री कह सकता है कि संविधान के लागू होने के मौके को सैन्य प्रदर्शन के साथ क्यों मनाया जाता है, लेकिन उसे अंत समय में रोकने का फैसला कर टकराव नहीं पैदा करना चाहिए. मैं साफ कर दूं कि मुङझे सरकार छोड़ कर सड़क पर लंबे समय के लिए उतरने का फैसला भी उचित नहीं लगता. विदेशी महिला और कानून मंत्री दोनों ही तरफ से मामला बेहद गंभीर है, लेकिन इसके नाम पर इतना बड़ा बवाल करने की जरूरत नहीं थी. इसके बहाने जरूर दिल्ली को संपूर्ण राज्य देने का मसला उठाया जाना चाहिए, पर उसे किसी और मंच एवं रणनीति से किया जा सकता था. लेकिन यह फैसला आम आदमी पार्टी का है. वह जो भी कर रही है, उसके बारे में पहले उन लोगों को समझाना जरूरी है, जो उससे अपेक्षा रखते हैं कि उनकी राजनीति कांग्रेस-बीजेपी की तुलना में नयी और परिपक्व होगी.

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