आउटडेटेड साहित्यिक पत्रिकाएं

प्रभात रंजन कथाकार हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाएं आउटडेटेड होती जा रही हैं- हिंदी के एक उत्साही शोधार्थी की यह बात तब मुझे मजाक से अधिक कुछ भी नहीं लगी थी. लेकिन, बाद में ठहर कर इस बात पर सोचा, तो सोचता ही चला गया. 80 के दशक में बड़े हुए मेरे जैसे लोगों को साहित्य […]

प्रभात रंजन

कथाकार

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाएं आउटडेटेड होती जा रही हैं- हिंदी के एक उत्साही शोधार्थी की यह बात तब मुझे मजाक से अधिक कुछ भी नहीं लगी थी. लेकिन, बाद में ठहर कर इस बात पर सोचा, तो सोचता ही चला गया. 80 के दशक में बड़े हुए मेरे जैसे लोगों को साहित्य से जोड़ने में जिन लघु पत्रिकाओं ने भूमिका निभायी थी, उनमें से कई अल्पजीवी साबित हुईं. जो बची हुई हैं, उनका कुछ प्रभाव है या नहीं, यह समझ में नहीं आता है.

मुश्किल से 5-7 साल पहले तक ऐसी कई पत्र-पत्रिकाएं थीं, जिनमें प्रकाशित होना लेखकों की जमात में पहचान बनाना होता था. 2002 में जब ‘तद्भव’ पत्रिका में मुजफ्फरपुर के तवायफों के जीवन पर मेरी एक कहानी प्रकाशित हुई थी, तो लेखक के रूप में मेरी पहचान बनी थी.

कहने का मतलब यह है कि ‘तद्भव’ जैसी न जाने कितनी पत्रिकाएं तब थीं, जो युवा लेखकों को मंच देती थीं, उनके लेखन की संभावनाओं को विस्तार देती थीं. आज अचानक इन पत्रिकाओं की कोई उपयोगिता, कोई प्रासंगिकता समझ में नहीं आती है. ऐसा नहीं है कि पत्र-पत्रिकाएं निकल नहीं रही हैं. अनेक नयी-नयी पत्रिकाएं निकल रही हैं. लघु पत्रिकाओं का जोर कम नहीं हुआ है.

फिर क्या कारण है कि वे अप्रासंगिक होती जा रही हैं? क्या कारण है कि उनका होना हिंदी समाज को अब पहले की तरह प्रभावित नहीं कर पा रहा है? इसके कारण बहुत गहरे हैं. आज सोशल मीडिया ने नवलेखन के लिए एक मजबूत जमीन तैयार की है. आज फेसबुक के साथ-साथ कई ऐसी वेबसाइट्स हैं, जहां से नये लेखकों की पहचान अधिक पुख्ता होती है.

जहां छपने से वे लेखकों के साथ-साथ पाठकों और प्रकाशकों की नजर में भी आते हैं. लेकिन लघु पत्रिकाओं के प्रति पूरे सम्मान का भाव रखते हुए भी यह कहने से खुद को नहीं रोक पा रहा हूं कि उनकी पहुंच बहुत कम है. आज पुस्तक मेलों, सोशल मीडिया, वेबसाइट्स, ब्लॉग्स के कारण हिंदी में लेखन, पाठकों का जो विस्तार हुआ है, उसमें लघु पत्रिकाएं सच में लघु लगने लगी हैं. वह उन नये बनते पाठकों तक पहुंच नहीं पा रही हैं.

लेकिन इससे भी बड़ा कारण है जो मुझे अधिक गहरा लगता है, वह यह है कि हिंदी पाठकों का सिर्फ विस्तार ही नहीं, बल्कि उनकी रुचि का विस्तार, परिष्कार हुआ है. आज युवा लेखन में लोकप्रिय, युवा जीवन के अधिक करीब रह कर कहानियां, उपन्यास लिखे जा रहे हैं, लेकिन लघु पत्रिकाओं में आज भी वही पुराना विश्वविद्यालयीय मॉडल चला आ रहा है. जिसमें बड़े-बड़े वैचारिक निबंध या लंबी-लंबी कहानियां ऐसे छपती हैं, जैसे लंबा लिखना हिंदी का बहुत बड़ा मूल्य हो, जिसको बचाये रखने के लिए लेखक-संपादक संघर्ष कर रहे हों.

आज एक भी लघु पत्रिका ऐसी नहीं है, जिसमें हिंदी के नवोन्मेष के लिए कोई जगह हो. समय के साथ नहीं बदलना ही अप्रासंगिक हो जाना होता है. एक और बड़ी बात है, जो इस संकट को और गहरा बनाती है, वह है संपादक नाम की संस्था का ह्रास. हंस के संपादक राजेंद्र यादव की मृत्यु के बाद यह संकट और भी गहरा हो गया है.

नब्बे के दशक में जब व्यावसायिक पत्रिकाएं बंद हो रही थीं, तब हिंदी साहित्य को बचाये रखने में इन लघु पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका थी. इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.

लेकिन, इतिहास का चक्र घूमता रहता है. बदलाव विकास का शाश्वत सत्य है. पिछले कुछ वर्षों में हिंदी के साहित्यिक परिसर का इस कदर विस्तार हो चुका है कि लघु पत्रिकाएं, हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएं उसको समझ पाने में असफल साबित हुई हैं. यह हिंदी की बहुत बड़ी विरासत थी, जो अब अस्ताचलगामी है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >