अमेरिका अपने इतिहास की सबसे भयावह गोलीबारी की त्रासदी का सामना कर रहा है. ओरलांडो के क्लब को निशाना बना कर हत्यारे ने समलैंगिकों के प्रति अपनी खतरनाक घृणा को प्रदर्शित किया है. लेकिन, यह हमला सिर्फ समलैंगिकों पर नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की अवधारणा पर बड़ी चोट है. यह अतिवादी और चरमपंथी हिंसा का भयावह उदाहरण है. जानेमाने पत्रकार फ्रैंक ब्रुनी ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में रेखांकित किया है कि हमलावर संदेश देने के लिए जनसंहारों के स्थान और पीड़ितों का चुनाव करते हैं.
उधर, राष्ट्रपति ओबामा ने उचित ही कहा है कि घटना की जगह एक नाइटक्लब ही नहीं है, यह सहभागिता और सशक्तीकरण की जगह है, जहां लोग जागरूकता का प्रसार करने, अपनी बात का इजहार करने और अपने अधिकारों की पक्षधरता के लिए एकत्र हुए थे. इस लिहाज से यह घटना अमेरिकी सरकार और समाज समेत पूरी दुनिया के लिए स्वतंत्रता और आतंक को लेकर नये सिरे से सोचने की चुनौती भी है. इसके साथ ही अमेरिका को बंदूक और हिंसा की संस्कृति पर भी आत्ममंथन करने की जरूरत है. अमेरिका में गोलीबारी में मरनेवाले लोगों की संख्या आतंक, युद्ध, एड्स, ड्रग्स आदि के शिकार लोगों से बहुत अधिक है.
वहां सालाना तकरीबन 30 हजार लोग बंदूकों का शिकार होते हैं. बंदूक निर्माताओं के प्रतिनिधि संगठन नेशनल शूटिंग स्पोर्ट्स फाउंडेशन के अनुसार अमेरिका में 30 करोड़ से अधिक बंदूकें हैं, जबकि देश की आबादी 32 करोड़ के आसपास है. जनसंहार के कई अभियुक्त आपराधिक पृष्ठभूमि और मानसिक बीमारी के बावजूद बंदूकें खरीदने में कामयाब रहे.
ओरलांडो के हत्यारे ने भी वैधानिक रूप से हथियार और कारतूस खरीदे थे. राष्ट्रपति ओबामा ने इस साल के शुरू में बंदूकों पर नियंत्रण के लिए एक ठोस योजना का प्रस्ताव किया था, लेकिन हथियारों के कारोबारियों की मजबूत लॉबी और पक्ष-विपक्ष के अनेक राजनेताओं के अड़ंगे के कारण इस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है.
हालांकि कुछ अमेरिकी राज्यों में कड़े प्रावधान किये गये हैं, लेकिन अन्य राज्यों से बंदूक खरीद कर उन राज्यों में ले जाना बहुत मुश्किल नहीं है. शायद ओरलांडो के बाद इस दिशा में कुछ निर्णायक पहल हो और मौतों के इस सिलसिले पर लगाम लगे.
