गिरींद्र नाथ झा
ब्लॉगर एवं किसान
इन दिनों किसानी समाज धान की खेती की तैयारी में जुटे हुए हैं. खेतों के कुछ हिस्सों में धनरोपनी के लिए बीज गिराने के बाद किसान खेत को तैयार करने में लग चुका है. बस कुछ ही दिनों में धनरोपनी में किसान रम जायेगा. फिर तो अंचल धान की हरियाली में डूब जायेगा.
आज बात धनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर की. दरअसल, कादो से सने पैर ही किसान की ताकत हैं. धरती की महक और पानी का मिश्रण किसान के मन को मजबूत करता है. धनरोपनी के वक्त खेत में खेती के संग गीत-नाद का भी माहौल बना रहता है. यही अंचल की सांस्कृतिक विरासत है.
मुझे याद है जब खेतों में धनरोपनी के गीत गूंजा करते थे. अब यह सुनने को नहीं मिल पाता है. मोबाइल में कोई गीत बजता रहता है और लोगबाग फटाफट रोपनी कर निकल जाते हैं. नब्बे के दशक तक धनरोपनी ‘उत्सव’ की तरह थी. खेत उस वक्त गीत और कीचड़ की छै-छप संगीत में डूबा रहता था.
खेती-बाड़ी की बात करें और मन में रेणु न आयें, ऐसा भला कभी हुआ है क्या? फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि ‘खेती करना कविता करना है, कहानी लिखना है.’ रेणु ने एक दफे कहा था, ‘एक एकड़ धरती में धान उपजाना, उपन्यास लिखने जैसा है. लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में.’ वे खेती को अलग नजरिये से लोगों के सामने लाते थे. एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- ‘आबरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान. पूर्णिया के बसइया, रहै चदरवा तान.’
लेकिन समय का चक्र इन दिनों किसानों को सबसे अधिक परेशान कर रहा है. देश के कई हिस्सों में बारिश हो रही है, लेकिन कई इलाके ऐसे भी हैं, जहां वक्त पर बारिश नहीं होने की वजह से किसानों को धान की रोपनी में दिक्कत हो रही है. पटवन के लिए पानी की व्यवस्था ठीक नहीं रहने के कारण किसानों की समस्या और बढ़ जाती है. हालांकि सरकार घोषणा कर रही है कि इस बार सिंचाई की सुविधा दी जायेगी, लेकिन किसानी समाज घोषणाओं पर अब भरोसा नहीं करता है. वह तो डीजल फूंक कर अब किसानी करता है.
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से पानी का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है, जिस वजह से बोरिंग महंगा होता जा रहा है. छोटे किसानों को सबसे अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं रोपनी के लिए मजदूरों का अभाव भी देखने को मिल रहा है.
दरअसल, बिहार से कामकाजी ग्रामीण लोगों का अन्य राज्यों की ओर पलायन कम जरूर हुआ है, लेकिन अभी खत्म नहीं हुआ है. मजदूरी की दर इसकी एक मुख्य वजह है. बिहार की तुलना में अन्य राज्यों में उन्हें अच्छी मजदूरी मिल जाती है. बिहार में किसानी कर रहे मजदूर वर्ग अब किसानी के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी काम करने लगे हैं, मसलन रियल इस्टेट, बिजली, सड़क-निर्माण आदि में. इसलिए यहां खेत में काम करने के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं.
ऐसे में गांव घर की खेती-बाड़ी प्रभावित होती है, जिसका खामियाजा न केवल किसानी कर रहे लोगों को उठाना पड़ता है, बल्कि बाजार भी प्रभावित होता है. पंचायत स्तर पर जब लोगों को काम मिलना शुरू होगा, तब पलायन कुछ कम होगा और लोगबाग किसानी की तरफ मुड़ेंगे. इन सभी मसलों को ग्रामीण मसलों से जुड़े विभागों को समझना होगा.
रेणु, कोसी के जिस इलाके में पटुआ (जूट) की खेती से खुशहाल रहनेवाले किसानी युग की चर्चा करते थे, अब वह युग बदल गया है. ऐसे में सरकारी तंत्र को इस ओर देखना होगा, ताकि एक बड़े तबके का इस किसानी-व्यवस्था से मोहभंग न हो और किसानी समाज एक बार फिर धनरोपनी के गीतों में रम जाये…
