आंकड़ों की जटिलता

हाल में जारी सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सरकार पर आरोप है कि उसने अधिक वृद्धि दर दिखाने के लिए गलत आंकड़े पेश किये हैं. इन आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2015-16 की आखिरी तिमाही में सकल जीडीपी की वृद्धि दर 7.9 फीसदी रही है, जो […]

हाल में जारी सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सरकार पर आरोप है कि उसने अधिक वृद्धि दर दिखाने के लिए गलत आंकड़े पेश किये हैं. इन आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2015-16 की आखिरी तिमाही में सकल जीडीपी की वृद्धि दर 7.9 फीसदी रही है, जो गत छह तिमाहियों में सर्वाधिक है.

पूरे वित्त वर्ष में यह दर 7.6 फीसदी रही है, जो बीते पांच सालों में सबसे ज्यादा है. इस लिहाज से भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से विकास करनेवाला देश हो गया है. अनेक जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि जनवरी से मार्च की तिमाही की वृद्धि दर में ‘डिस्क्रेपेंसिज’ का योगदान बहुत अधिक है. निजी उपभोग खर्च, सरकारी खर्च, निवेश और वास्तविक उत्पादन एवं निर्यात के हवाले से जीडीपी के आकलन में अंतर से ‘डिस्क्रेपेंसिज’ निर्धारित की जाती हैं.

जनवरी से मार्च तक की तिमाही में ‘डिस्क्रेपेंसिज’ स्थिर मूल्यों पर 1.43 ट्रिलियन रही हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में ये मात्र 29,933 करोड़ रही थीं. इस आधार पर आलोचकों का कहना है कि वास्तविक वृद्धि दर बतायी जा रही दर से बहुत कम है. अगर हम पिछले आंकड़ों और उन्हें जुटाने तथा विश्लेषित करने की स्थापित व्यवस्था पर नजर डालें, तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) विभिन्न संस्थाओं और विभागों के आंकड़ों के आधार पर विकास दर निर्धारित करता है. हमारे सांख्यिकी विशेषज्ञ दक्षता और विश्वसनीयता के लिए दुनियाभर में प्रतिष्ठित हैं.

आंकड़े इकट्ठा करने की प्रक्रिया भी विकेंद्रित है. ऐसे में बड़े पैमाने पर हेर-फेर की गुंजाइश न के बराबर है. जहां तक ‘डिस्क्रेपेंसिज’ का सवाल है, तो 2013-14 और 2014-15 में उनकी मात्रा नकारात्मक रही थी और 2016 के जनवरी-मार्च में ‘डिस्क्रेपेंसिज’ 4.8 फीसदी है, तो 2012 के अक्तूबर-दिसंबर की तिमाही में उनकी मात्रा 4.5 फीसदी रही थी.

वित्त वर्ष 2015-16 में पूरे साल इनकी मात्रा महज 1.9 फीसदी ही है. यह सही है कि हमारे देश में आंकड़े और सूचनाएं जमा करने की प्रक्रिया में अनेक खामियां हैं, लेकिन उच्च वृद्धि दर दिखाने के लिए उनमें जान-बूझ कर हेर-फेर करने का आरोप तार्किक नहीं है. यदि वृद्धि दर में कमी भी कर दें, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में है. जरूरत इस बात की है कि इस विकास का समुचित लाभ आम लोगों तक पहुंचाने का ठोस प्रयास किया जाये.

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