हावी होते कट्टरपंथी

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यकों, उदारवादी व धर्मनिरपेक्ष सोच वाले लेखकों-ब्लॉगरों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को जिस तरह से सुनियोजित हमले करके मौत के घाट उतारा जा रहा है, उसकी जितनी भी निंदा की जाये कम होगी. खुद बांग्लादेश पुलिस मान रही है कि बीते डेढ़ बरस में ही ऐसी 40 से ज्यादा […]

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यकों, उदारवादी व धर्मनिरपेक्ष सोच वाले लेखकों-ब्लॉगरों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को जिस तरह से सुनियोजित हमले करके मौत के घाट उतारा जा रहा है, उसकी जितनी भी निंदा की जाये कम होगी. खुद बांग्लादेश पुलिस मान रही है कि बीते डेढ़ बरस में ही ऐसी 40 से ज्यादा हत्याएं हो चुकी हैं. इनमें से ज्यादातर हत्याओं की जिम्मेवारी खूंखार आतंकी संगठन इसलामिक स्टेट या फिर अलकायदा ने ली है.
ऐसे में शेख हसीना सरकार का यह दावा खोखला ही कहा जायेगा कि बांग्लादेश में इसलामिक स्टेट की मौजूदगी नहीं है और इन हत्याओं के पीछे स्थानीय चरमपंथी गुटों या विरोधियों का हाथ हो सकता है. कट्टरपंथियों के ताजा हमले में मंगलवार को एक हिंदू पुजारी को मौत के घाट उतार दिया गया. 70 वर्षीय पुजारी आनंद गोपाल गांगुली का सिर कटा शव पश्चिमी झेनाइदाह जिले में उनके मंदिर के नजदीक मिला.
इससे दो दिन पहले, रविवार की सुबह चटगांव में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जो चरमपंथियों के खिलाफ कई छापामारी अभियानों में शामिल रहे हैं, की पत्नी की बस स्टैंड जाने के रास्ते में हत्या कर दी गयी. इसी दिन दोपहर में उत्तर-पश्चिमी नाटोर जिले में एक ईसाई कारोबारी को चर्च के पास बेरहमी से मार डाला गया. ये घटनाएं जाहिर करती हैं कि सरकार स्थानीय कट्टरपंथियों के उभार और अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों के साथ उनकी सांठगांठ पर अंकुश लगाने में पूरी तरह विफल रही है.
बांग्लादेश की मौजूदा सरकार कहने को तो धर्मनिरपेक्षता की तरफदार है, लेकिन कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई में उसकी विफलता संकेत करती है कि उसे देश के अल्पसंख्यकों और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले लोगों से ज्यादा अपने तात्कालिक राजनीतिक नफा-नुकसान की फिक्र है.
सरकार को समझना चाहिए कि उसकी ढिलाई से ऐसी हिंसक घटनाएं जल्द ही एक लाइलाज मर्ज में तब्दील हो सकती हैं. उधर, इसलामिक स्टेट जिस तरह से बांग्लादेश के जरिये भारत में घुसपैठ करने के मंसूबे संजो रहा है, उसके मद्देनजर भारत सरकार को भी इन हत्याओं के प्रति समय रहते सचेत होना चाहिए. इन हत्याओं के निहितार्थ को समझने में हुई चूक हमारी सीमा पर भी अशांति का सबब बन सकती है.

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