विमेन ट्रैफिकिंग हमारे देश के लिए एक अभिशाप है, लेकिन थोड़ी-सी दूरदर्शिता, प्रयत्न और संवेदनशीलता से हम इस अभिशाप को वरदान में बदल सकते हैं. बाहर जानेवाली ज्यादार महिलाएं घरेलू कामगार होती हैं. इस असंगठित क्षेत्र में हम प्राय: शोषण ही देखते हैं. यौन शोषण के मामले को छोड़ भी दें, तो शारीरिक एवं मानसिक शोषण इन गरीबों का प्रारब्ध बन चुका है. लेकिन सुरक्षा, सम्मान और समुचित मजदूरी इनका भी हक है.
इनकी न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के दशकों से प्रयास चल रहे हैं, लेकिन जिन लोगों पर इसे तय करने की जिम्मेदारी है, उनका भी स्वार्थ इसमें आड़े आता है. शायद इसलिए भी इसके क्रियान्वयन में वे टाल-मटोल की नीति अपनाये हुए हैं. अब समय आ गया है कि इसके लिए समुचित मैकेनिज्म विकसित करना होगा. महिला, बाल विकास एवं समाज कल्याण विभाग तथा श्रम कल्याण विभाग के अनेक कार्यो में से एक यह भी है कि वह घरेलू कामगारों के हितों की रक्षा करें. इसके लिए हर राज्य में एक-एक कोषांग की स्थापना होनी चाहिए.
यहां घरेलू कामगारों का अनिवार्य नि:शुल्क निबंधन होना चाहिए. उनका फोटो सहित विस्तृत ब्योरा सरकारी आंकड़ों में दर्ज हो. साथ ही, इन्हें ले जानेवालों का भी फोटो सहित विस्तृत ब्योरा सरकारी आंकड़ों में दर्ज होना आवश्यक है. यहां से क्लीयरेंस लेकर ही लोग इन्हें साथ ले जायें. इससे नियोक्ता घरेलू कामगारों का शोषण करने का दुस्साहस नहीं कर सकेंगे. इन सारे कार्यो में सरकार के साथ ही स्वयंसेवी संस्थानों की भी अहम भूमिका हो सकती है. क्या हम देवयानी खोब्रागड़े के भारतीय संस्करण होने तक निष्क्रिय एवं चुप बैठे रहेंगे?
डॉ उषा किरण, खेलगांव, रांची
