अरविंद केजरीवाल का विरोध करने के लिए सभी अलग-अलग विचारधारावाली पार्टियां एक मंच पर दिखाई देने लगती हैं. हकीकत यह है कि इस नयी सोचवाली सरकार को, केंद्र एवं उपराज्यपाल मिल कर, काम ही नहीं करने दे रहे हैं. मसलन पिछले नवंबर में ही जनलोकपाल बिल को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया.
अब जवाब आ रहा है चूंकि इसमें केंद्रीय कर्मचारियों को भी जांच के दायरे में लाया गया है, इसलिए इस बिल को मंजूरी नहीं मिल सकती. क्या केंद्रीय कर्मचारी, भ्रष्टाचार नहीं करते? इधर कांग्रेस एवं भाजपा के लोग दिल्ली के जन्म से ही उसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा हर चुनाव में करते आ रहे हैं.
अब जब दिल्ली सरकार ने उसका ड्राफ्ट तैयार करके जनता के समक्ष रख दिया है, तो दोनों बड़ी पार्टियां नाक-मुंह सिकोड़ रही हैं. यह तो महज बानगी है, दिल्ली सरकार के 70 प्रतिशत निर्णयों को अमान्य कर दिया गया है, ताकि जनता को लगे कि यह सरकार निकम्मी है.
जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर
