राजा और प्रजा का पिता-पुत्र तुल्य रिश्ता होता है, जिसमें राजा ही सदैव बड़ा है क्योंकि वह अपने पुत्र तुल्य प्रजा की उचित देखभाल और पालन पोषण करता है. फिर भी बेचारी जनता कई बार अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए आंदोलन, हड़ताल या मीडिया का सहारा लेना पड़ता है. लेकिन हमारे शासक कहां और कितना सुनते हैं, यह जगजाहिर है.
यहां तो बेचारे आवाज उठाने वाले मीडियाकर्मियों और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या तक करा दी जाती है. कितने दुःख की बात है कि इतना सब होने पर भी जनता को ही दोषी माना जाता है. आज जालिम भ्रष्टाचार के कारण हर जगह अराजकता का माहौल है.
सुशासन के लिए ही तो सरकार होती है, वरना तो इसकी जरूरत ही क्या है? इसकी घोर उपेक्षा, उदासीनता और अकर्मण्यता से ही तो आज देश में अपराध का नेक्सस चल रहा है. नागरिकों का सहयोग तो अपेक्षित है, मगर पूरा काम तो सरकार का ही है.
वेद प्रकाश, ई-मेल से
