चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज
नाजाने कितने प्रसंगों और कितनी दफे गालिब के इस शेर को दोहराया है कि ‘तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना- कि खुशी से मर न जाते गर ऐतबार होता.’ यह जताता कि वादे तो टूटने के लिए ही होते हैं, हर बार यह शेर बेआसरा छोड़ गया है. मई के पहले हफ्ते में एक बुजुर्ग की आपबीती सुनते हुए फिर ऐसा ही हुआ.
राष्ट्रीय गर्व के उद्घोषक इतिहास में गोगुंदा (राजस्थान) महाराणा प्रताप के राजतिलक स्थल के रूप में मशहूर है. मई दिवस पर उम्र की छह दहाई पार कर चुके इन बुजुर्ग से यहीं भेंट हुई. स्थानीय स्वयंसेवी संस्था आजीविका ब्यूरो ने कुछ निर्माण-मजदूरों को राजतिलक-स्थल पर जुटाया था. यह संस्था प्रवासी मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए काम करती है.
इलाके के विधायक, सरपंच आनेवाले थे. सबकी मौजूदगी में मजदूरों की फरियाद सुनी जानी थी, आजीविका ब्यूरो की अगुवाई में एक मांग-पत्र दिया जाना था. मांग-पत्र में फरियादी निर्माण-मजदूरों की एक मांग पुरजोर थी- बेटी के ब्याह के निमित्त सहायता राशि के रूप में 51 हजार रुपये देने के वादे को पूरा करने की मांग! निर्माण-मजदूरों की उस सभा में इस मांग के पक्ष में उठनेवाले हाथों में एक हाथ सफेद पगड़ी और उदास आंखों वाले उन बुजुर्ग परसराम का भी था.
बाकी राज्यों की तरह राजस्थान में भी 1996 के एक अधिनियम के तहत ‘भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक कल्याण मंडल’ बना है. मंडल पंजीकृत निर्माण-मजदूरों के लिए बहुत सी कल्याण योजनाएं चलाता है, जिनमें से एक है- पंजीकृत निर्माण मजदूर की बेटी की शादी के लिए 51 हजार रुपये की सहायता राशि देना. राजतिलक स्थल पर जुटे निर्माण-मजदूरों की तरह परसराम भी पंजीकृत हैं.
सरकारी वादे के मुताबिक, उन्हें अर्जी देने पर सहायता राशि मिल जानी चाहिए थी, लेकिन जैसा कि ज्यादातर सरकारी वादों के साथ होता आया है, यह राशि अन्य निर्माण-मजदूरों की तरह परसराम को भी नहीं मिली है.
एक ऐसे पथरीले इलाके में जहां खेती से इतना ही उपजता है कि बस तीन महीने का ही गुजारा चले और जीविका के बाकी साधनों के अभाव में 50 फीसद से ज्यादा परिवार दिहाड़ी मजदूरी करके पेट पालते हैं.
साठ साल की उम्र पार कर चुके परसराम सरीखे सैकड़ों मजदूरों को सरकारी सहायता के रूप में नकद राशि मिले, तो उससे बहुधा समाज में रहने का ‘मरजाद’ निभाते हैं. परसराम ने यही किया था. कर्ज लेकर बेटी का ब्याह किया कि सहायता राशि मिलेगी तो चुका देंगे. कर्ज खेत गिरवी रखने पर मिला और अब कर्ज देनेवाला रिश्तेदार खेत अपने नाम करवाने पर तुला है. परसराम तीन छोरों पर लड़ रहे हैं.
उन्हें हाथ से जाते जीविका के आखिरी साधन खेत बचाना है, कर्ज चुका कर रिश्ता बचाना है और सहायता-राशि पाने के लिए रोज मंडल कार्यालय की दौड़-धूप करनी है, जहां उनसे बार-बार कहा जाता है कि तुम्हारी अर्जी दुरुस्त हुई तो आगे बढ़ेगी और राशि आयेगी तो दी जायेगी. उनके लिए यह संघर्ष एक अंतहीन सिलसिले में तब्दील हो गया है. परसराम शायद ना मानें, लेकिन उनकी आपबीती का कड़वा सच यही है कि वे सरकारी वादे पर यकीन करके छले गये हैं.
क्या सचमुच वादे ना निभाने के लिए किये जाते हैं? दरअसल एेतबार ना करें और वादे ना निभाये जायें, तो निजी और सार्वजनिक जीवन संभव ही नहीं. एेतबार सिर्फ नेह-नातों या टोले-मोहल्ले में रीत की भीत पकड़ कर चलनेवाली जिंदगी की ही बुनियाद नहीं, राष्ट्र के फलक पर नागरिक बन कर जीये जानेवाली जिंदगी की भी आधारशिला है. राष्ट्र-समान भाव-भूमि के लोगों के साथ रहने-जीने के नियम-कायदों को स्थिर करने के एक विराट वादे के अतिरिक्त क्या है? सुथरी हुई राजनीतिक भाषा में इस वादे को हम संविधान कहते हैं.
संविधान नाम के इस विराट वादे पर एेतबार ना करें, तो ना राष्ट्र संभव है और ना ही साझे में चलनेवाला राष्ट्रीय जीवन! इस राष्ट्रीय जीवन को चलाने के लिए लोगों की चुनी हुई एक व्यवस्था (सरकार) वादे करने और उनके निभाये जाने से ही चलती है. लोगों की भलाई को लक्ष्य करके बनाये जानेवाले सरकारी कार्यक्रम भी एक तरह का वादा ही हैं. तभी तो इन कार्यक्रमों की सफलता-असफलता किन्हीं अर्थों में स्वयं सरकारी की सफलता-असफलता की कसौटी मान कर बरती जाती है.
डाॅक्टर गलत दवा लिखे, इंजीनियर घटिया नक्शा बनाये और शिक्षक ‘अलिफ’ की जगह ‘बे’ सिखाये, तो हमारी व्यवस्था ने इसके लिए एक सजा तय कर रखी है, लेकिन वादा ना निभानेवाली सरकार के लिए परसराम जैसे असहाय बुजुर्ग कौन सी सजा तय करें?
