कॉल ड्रॉप के मामलों में उपभोक्ताओं को मुआवजा देना अनिवार्य बनाने के टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राइ) के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक देश के करोड़ों टेलीकॉम उपभोक्ताओं को निराश कर सकती है.
लेकिन, इसमें यह संदेश छिपा है कि जब सरकार या उसकी कोई संस्था वैधानिक प्रावधानों का ख्याल किये बिना, लोकप्रियता पाने के उद्देश्य से फैसले लेती है, तब उसका यही हश्र होता है. सुप्रीम कोर्ट ने ट्राइ के आदेश को मनमाना, अतर्कसंगत और गैर-पारदर्शी बताया है. साथ ही कहा है कि सरकार चाहे तो ऐसे कदमों के लिए कानून बना सकती है. इससे जाहिर है कि ट्राइ द्वारा आदेश को जारी करने से पहले इसके वैधानिक पहलुओं की गंभीरता से पड़ताल नहीं की गयी थी. इसमें दो राय नहीं है कि एक अरब से अधिक टेलीफोन उपभोक्ताओं के देश भारत में कॉल ड्रॉप की समस्या लगातार गंभीर होती गयी है.
ट्राइ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 20 करोड़ से अधिक उपभोक्ता कॉल ड्रॉप की समस्या से परेशान होकर मौजूदा सेवा प्रदाताओं से निजात पाना चाहते हैं और उन्होंने मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) के लिए आवेदन कर रखा है. ऐसे में उपभोक्ता हितों की रक्षा के नाम पर ट्राइ ने हर कॉल ड्रॉप पर उपभोक्ताओं को एक रुपये (प्रतिदिन अधिकतम तीन रुपये) का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जो एक जनवरी, 2016 से लागू होना था.
ट्राइ की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि टेलीकॉम कंपनियां कॉल सेवा से प्रतिदिन 250 करोड़ रुपये की कमाई कर रही हैं, लेकिन सर्विस क्वाॅलिटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार पर उनके निवेश का प्रतिशत दुनिया के प्रमुख देशों की कंपनियों की तुलना में बेहद कम है. दूसरी ओर, टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां शुरू से ही मुआवजा देने जैसी किसी व्यवस्था का विरोध कर रही थीं.
हालांकि, कंपनियों के संगठन की याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट ने ट्राइ के फैसले को उचित ठहराया था. ऐसे में हाइकोर्ट के फैसले के ठीक विपरीत आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से टेलीकॉम कंपनियों को निश्चित रूप से बड़ी राहत मिली है. फिर भी, उम्मीद करनी चाहिए कि इस राहत को कंपनियां उपभोक्ता हितों के साथ खिलवाड़ की छूट नहीं समझेंगी और कॉल ड्रॉप की समस्या में सुधार लायेंगी.
