मांग में बढ़ोतरी से उत्पादन में वृद्धि होती है. उत्पादन के बढ़ने से लोगों को रोजगार मिलता है. अर्थव्यवस्था के इस सामान्य से तर्क की कसौटी पर देखें, तो भारत का आर्थिक भविष्य मुश्किलों में घिरा नजर आ रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवंबर, 2013 में देश के औद्योगिक उत्पादन में 2.1 फीसदी की गिरावट आयी है. अक्तूबर में इसमें 1.8 फीसदी की कमी आयी थी.
ये आंकड़े हमें भारतीयों की क्रय शक्ति लगातार कम होने के कड़वे सच से मुखातिब कर रहे हैं. आसमान छूती महंगाई ने लोगों की जेबों की सुराख को इतना बड़ा कर दिया है कि उनके पास उपभोक्ता सामानों की खरीद के लिए न ज्यादा पैसा बचा है, न हिम्मत. भारतीय स्वभाव से उत्सवधर्मी होते हैं. यही कारण है कि आमतौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को दुर्गापूजा-दीपावली के महीने में और सफल मॉनसून से संभव होनेवाली अच्छी कृषि के बल पर रफ्तार पकड़ते देखा जाता है. लेकिन 2013 में अच्छे मॉनसून के बावजूद त्योहारों का मौसम भी उद्योग जगत और बाजार के चेहरे पर खुशी का एक कतरा भी नहीं ला पाया. सोने की खरीद में कमी की खबर तो धनतेरस के दिन ही आयी थी, अब सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि नवंबर महीने में टेलीविजन, फ्रिज जैसे सामानोंवाले कंज्यूमर ड्यूरेबल उद्योग में भी 21.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी.
उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत और संदेश इतने साफ हैं कि उन्हें नजअंदाज नहीं किया जा सकता. इन आंकड़ों का संभवत: सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मंदी की सबसे ज्यादा मार रोजगार गहन या ज्यादा लोगों को काम देनेवाले उद्योगों पर पड़ी है. यानी मंदी की खबर सिर्फ बही-खाते तक सीमित नहीं रहनेवाली, इसका असर देर-सवेर लाखों लोगों के रोजगार पर पड़ सकता है. सवाल है क्या इस महंगाई, मंदी और बेरोजगारी के चक्रव्यूह से निकलने का कोई विकल्प हमारे पास है? क्या मौजूदा सरकार इस दिशा में सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकती है? आम चुनाव सिर पर होने के कारण, इसकी संभावना कम ही है. उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि इस दिशा में कोई कदम अब अगली सरकार ही उठा पायेगी. ऐसे में अगले छह-सात महीने भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकते हैं!
