झारखंड में विकास का आधार क्या है? जवाब है, खनिज संपदा व उद्योग. जिस राज्य में टाटा मोटर्स व एचइसी जैसी कंपनियां हों, जब उस राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो जाये, तो निश्चित रूप से कहीं-न-कहीं व्यवस्था में दोष है. झारखंड से कंपनियां क्यों भाग रही हैं, इस पर सरकार को मंथन करना चाहिए. जिस टाटा मोटर्स की गाड़ियों की मांग दुनिया के कई देशों में हो, वहां अगर कोई विदेशी अतिथि आना चाहे तो भी कैसे?
जमशेदपुर जैसे शहर में एयरपोर्ट नहीं है. जिस कारण सही कनेक्टिविटी नहीं है. इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है? ऐसा नहीं है कि योजनाएं नहीं बनीं. 4000 करोड़ की विकास योजनाएं बनीं, लेकिन इस पर अमल नहीं किया गया. झारखंड की किसी भी सरकार ने उद्योग को बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया. राज्य गठन के बाद कई कंपनियों के साथ एमओयू तो हुआ, लेकिन सभी साल-दो साल में रद्द हो गये. कारण, आधारभूत संरचना की कमी. जमीन व विस्थापन संबंधित स्पष्ट नीति का अभाव. अब जबकि टाटा जैसी कंपनियां अपनी कई इकाइयों को दूसरे राज्यों में शिफ्ट करने की योजना बना रही हैं, तब जाकर झारखंड की सरकार को होश आयी है.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जमशेदपुर में ही सीआइआइ के कार्यक्रम में उद्योगों को बचाने के लिए एक साथ कई घोषणाएं कर डालीं. झारखंड में उद्योग से संबंधित टैक्स में छूट दी जायेगी. इसके अलावा मोटर पार्ट्स में वैट को घटा कर 14 फीसदी से चार-पांच फीसदी किया जायेगा. वहीं उद्योग की समस्या को दूर करने के लिए टास्क फोर्स गठन करने की बात कही है. इससे निश्चित रूप से लाभ मिलेगा. वैसी मृतप्राय कंपनियां जो अपना काम समेटने की तैयारी में हैं, वे फिर से कारोबार खड़ा करने के बारे में सोच सकेंगी. झारखंड में उद्योग-धंधे के लिए अपार संभावनाएं हैं. जरूरत है, दूरदर्शी सोच के साथ आधारभूत संरचनाएं दुरुस्त करने की. अगर इस राज्य से जमीन संबंधित समस्या दूर हो जाती है, तो विकास के नये-नये द्वार खुलेंगे. झारखंड में अभी सूचना एवं प्रोद्यौगिकी कंपनियों का आना बाकी है. यहां की सरकार अगर स्पष्ट नीति के साथ औद्योगिक कंपनियों के लिए आधारभूत संरचना मुहैया कराती है, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखंड औद्योगिक क्षेत्र में देशभर में अग्रणी होगा.
