।। चंदन श्रीवास्तव।।
(एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस)
दिल्ली प्रदेश तो है लेकिन प्रादेशिकता के रंग-गंध से हीन है! दिल्ली प्रदेश है, क्योंकि कानून ने यह दरजा दिया है. परंतु वह प्रादेशिकता के रंग-गंध से हीन है, क्योंकि उसके दो दिल हैं. दिल्ली के भीतर एक ‘नयी दिल्ली’ बसती है, जो उसे कॉस्मोपॉलिटन बनाये रखने को बजिद है. सो, दिल्ली का सुभाव दोरंगा है.
प्रशासन को ही लीजिए, दिल्ली प्रदेश तो है लेकिन कानून-व्यवस्था की बहाली का जिम्मा यहां ‘केंद्र’ संभालता है. जो हाल विधि-व्यवस्था की बहाली और निगरानी के मामले में है, वही हाल उच्च शिक्षा के मामले में भी है! कायदे से दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन पर सिक्का दिल्ली की विधानसभा का चलना चाहिए, लेकिन उस पर रुतबा संसद का गालिब है. दिल्ली विवि का दर्जा केंद्रीय विश्वविद्यालय का है और चालन-प्रशासन में किसी महत्वपूर्ण फेरबदल के लिए बहुत जरूरी होगा दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम, 1922 में संशोधन करना. जाहिर है, यह संशोधन संसद ही कर सकती है, दिल्ली की विधानसभा नहीं.
दिल्ली के दोरंगे सुभाव का एक नमूना फिलहाल आम आदमी पार्टी की सरकार में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया के बयान से उपजे हंगामे में नजर आ रहा है. सिसोदिया की मानें, तो दिल्ली विवि (डीयू) से संबद्ध जिन 12 कॉलेजों का खर्चा दिल्ली प्रदेश की सरकार उठाती है, उनकी 90 फीसदी सीटों पर नामांकन के हकदार दिल्ली के विद्यार्थी होंगे, वे विद्यार्थी जिन्होंने अपनी 12वीं की परीक्षा दिल्ली के स्कूलों से पास की है. प्रादेशिक स्वायत्तता के कोण से देखें तो तर्क बिल्कुल ठीक है. सिसोदिया ने साथ में यह भी जोड़ा कि दिल्ली विवि से संबद्ध जिन कॉलेजों को खर्चा चलाने के लिए 50 फीसदी तक अनुदान दिल्ली प्रदेश सरकार से मिलता है, उन्हें 50 फीसदी सीटें नियम लागू होने पर दिल्लीवासी छात्रों के लिए आरक्षित रखनी होंगी. ऐसे कॉलेजों की संख्या मात्र सोलह है. हिसाब लगाया जाये, तो डीयू से संबद्ध कुल 77 कॉलेजों में से मात्र 28 कॉलेजों में सीटों को दिल्ली के स्कूलों से 12वीं पास विद्यार्थियों के लिए आरक्षित करने की मंशा जाहिर की गयी है. जाहिर है, यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, क्योंकि दिल्ली के स्कूलों से सालाना 2.65 लाख विद्यार्थी 12वीं पास करते हैं, जिनमें से मात्र 90 हजार विद्यार्थियों को ही दिल्ली के किसी सरकारी कॉलेज में दाखिला मिल पाता है. आखिर ये विद्यार्थी उच्च शिक्षा का सपना पूरा करने कहां जायें? समाधान के तौर पर सिसोदिया का तर्क ठीक ही लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मात्र 28 कॉलेजों में आरक्षण दे देने से इतनी बड़ी तादाद की उच्च शिक्षा विषयक जरूरतें पूरी हो जायेंगी?
डीयू का शिक्षक समुदाय मनीष सिसोदिया की योजना से सहमत नहीं है. उसका तर्क है कि डीयू केंद्रीय विश्वविद्यालय है और उसके चरित्र में परिवर्तन की कोशिश नहीं होनी चाहिए. केंद्रीय विवि का चरित्र नामांकन के मामले में प्रादेशिकता को तरजीह देना नहीं है, उसके दरवाजे सिद्धांतया हर प्रदेश के उम्मीदवार के लिए खुले होते हैं. दिल्ली के कॉलेजों में दाखिले की हसरत लिये अन्य प्रदेशों से आनेवाले विद्यार्थियों की सालाना संख्या को देखें, तो डीयू के शिक्षक समुदाय की बात भी ठीक लगती है. पूर्वोत्तर के राज्यों के विद्यार्थियों को देश की मुख्यधारा में शामिल करने के लिहाज से डीयू के शिक्षक-समुदाय का तर्क और भी ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है कि अगर दिल्ली सूबे की सरकार को दिल्लीवासी छात्रों के हितों की फिक्र है, तो उसे बजाय सीटों को आरक्षित करने के नये कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने चाहिए.
मनीष सिसोदिया या फिर डीयू के शिक्षक समुदाय का तर्क सिद्धांत के धरातल पर अपनी-अपनी जगह ठीक हो सकते हैं. शिक्षक समुदाय का तर्क अवसर की समानता के सिद्धांत पर टिका है, जबकि सिसोदिया का तर्क सूबे की पहचान और स्वायत्तता के सिद्धांत पर. लेकिन यह बात भी ठीक है कि व्यवहार की जमीन पर सिद्धांत की लड़ाइयां अकसर लंगड़ी साबित होती हैं. डीयू के कॉलेजों में नामांकन के सिरे से किसी भी तरह का विधान करने की बात तब तक बेमानी है, जब तक यह न बता दिया जाये कि किस कॉलेज या फिर किस कोर्स में दाखिले की बात हो रही है. डीयू के कुछ कॉलेज और कोर्स ‘परमपावन’ की श्रेणी में आते हैं. ऐसे ‘कोर्स’ और ‘कॉलेज’ में दाखिले का तरीका बगैर शोर मचाये एक खास पृष्ठभूमि के (उच्च मध्यवर्ग और महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़नेवाले) छात्रों के लिए अपनी सीटें आरक्षित कर देता है. यह नजर आता है नामी कॉलेजों द्वारा नामांकन के वक्त विभिन्न कोर्स के लिए जारी की जानेवाली कट-ऑफ लिस्ट में. बीते साल डीयू के कॉलेजों में नामांकन के लिए पहली कट-ऑफ लिस्ट जारी हुई, तो बीटेक विषय में दाखिला लेनेवाले विद्यार्थी हतप्रभ थे कि 12वीं में 99 फीसदी से कम अंक लानेवालों के लिए कोई अवसर है ही नहीं.
भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लॉयड साइंस की पहली कट-ऑफ लिस्ट में शर्त 99.75 फीसदी अंकों की रखी गयी थी. हिंदू कॉलेज की पहली कट-ऑफ लिस्ट में बीकॉम में दाखिले की शर्त भी 99.75 फीसदी अंकों की थी. लेडी श्रीराम कॉलेज के जर्नलिज्म कोर्स में दाखिले के लिए 98.5 प्रतिशत अंकों का होना अनिवार्य था. कट-ऑफ की कैंची से दाखिले लेनेवाले छात्रों के सपने टूट जाते हैं, क्योंकि कुछ कॉलेज और कोर्स की सारी सीटें पहली या दूसरी कट-ऑफ लिस्ट जारी होते ही भर जाती हैं, जबकि शेष को दस-दस कट-ऑफ लिस्ट जारी करने के बाद भी दाखिले के लिए विद्यार्थी नहीं मिलते. बीते साल यही हुआ. डीयू प्रशासन को निर्देश जारी करके कॉलेजों से कहना पड़ा कि आरक्षित श्रेणी की खाली पड़ी सीटों को यथाशीघ्र भरें और कई कॉलेजों में कॉमर्स कोर्स की सीटें दसवीं लिस्ट जारी होने पर भी खाली पड़ी थीं.
गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा देश की आर्थिकी की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए जरूरी है और आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि देश की राज्यसत्ता ने इस संसाधन को कुछ इतना विरल बना रखा है कि एक को हासिल होता है, तो हजारों वंचित रह जाते हैं. संसाधन की ऐसी विरलता के बीच क्या अवसर की समानता की बात और क्या प्रादेशिक स्वायत्तता का राग! जाहिर है, डीयू में दाखिले की समस्या हाथी सरीखी विकराल है, सिसोदिया उस हाथी की पूंछ पकड़ कर उसे थाम लेने का कमाल करना चाहते हैं और डीयू का शिक्षक समुदाय एक झूठे मलाल में उबल रहा है कि मंत्री जी ने हाथी को जंगल से फांस कर अपने खूंटे में बांध लिया है!
