आत्महत्या करते नौजवान

अपने देश में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं. नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के नये आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें 18 से 30 साल आयुवर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा (44,870) थी. अगर इसमें 14 से 18 साल की उम्र में आत्महत्या करनेवाले किशोरों […]

अपने देश में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं. नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के नये आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें 18 से 30 साल आयुवर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा (44,870) थी.
अगर इसमें 14 से 18 साल की उम्र में आत्महत्या करनेवाले किशोरों की संख्या (9,230) को भी जोड़ दें, तो नजर आयेगा कि 2014 में आत्महत्या करनेवाले कुल लोगों में नवयुवक-युवतियों की तादाद करीब 40 फीसदी रही. इस चिंताजनक रुझान की पुष्टि एक नयी शोध रिपोर्ट से भी हुई है. प्रतिष्ठित लैंसेट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में भारत में आत्महत्या करनेवालों में 60 हजार से भी ज्यादा लोग महज 10 से 24 साल के थे.
किसी नौजवान ने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना- इस प्रश्न का सटीक उत्तर खोज पाना विद्वानों के लिए हमेशा से कठिन रहा है. अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कुछ विद्वान, जैसे समाजशास्त्री एमिल दुर्खाइम, आत्महत्या के कारणों को समाज में निहित मानते हैं, तो कुछ अन्य, जैसे अल्बेयर कामू, आत्महत्या की वजह किसी व्यक्ति की विशिष्ट मानसिक बनावट में तलाशने की बात कहते हैं. आत्महत्या के प्रसंग में व्यक्ति बनाम समाज का विवाद पुराना है और आगे भी रहेगा. लेकिन, यह बात तकरीबन निर्विवाद है कि हर आत्महत्या में जीवन के आखिरी क्षण तक खुद को बचा लेने की करुण पुकार होती है.
सुसाइड नोट में भले यह लिखा हो कि ‘मेरी आत्महत्या के लिए कोई जिम्मेवार नहीं’, तो भी आत्महत्या करनेवाले की जीवन-परिस्थितियां या फिर सुसाइड नोट का ही कोई अंश यह संकेत करने के लिए काफी होता है कि गहन मानसिक पीड़ा के बोध के बीच जिस घड़ी में किसी ने खुदकुशी का फैसला लिया था, उस घड़ी यदि सहारे की उम्मीद जगानेवाला कोई व्यक्ति या व्यवस्था मौजूद होती, तो यह दुखद फैसला बदल भी सकता था.
गौर करें, तो हमारे आसपास ऐसा सहारा आज दुर्लभ है. तेज विकास ने व्यक्तिगत होड़ को बढ़ाया है, जिसका सबसे ज्यादा शिकार नौजवान तबका है, क्योंकि राज, समाज और सार्वजनिक तौर पर प्रतिष्ठित की जा रही आकांक्षाएं उस पर जीवन की दौड़ में निरंतर आगे रहने का दबाव डालती हैं. जिस समाज में पारस्परिक सहयोग का स्थान आपसी प्रतिस्पर्धा ले ले, वह मनोविकार-ग्रस्त समाज है.
दुनियाभर के समाजविज्ञानी सन् 1930 से ही यह बताते आ रहे हैं कि ऐसे समाज में जीवन की रचनात्मक संभावनाएं लगातार क्षीण होती जाती हैं. युवाओं के बीच आत्महत्या की घटनाएं हमारी इसी नियति का संकेत है और देश-समाज को इसके प्रति खबरदार करती हैं.

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