पिछले साल अक्तूबर में खुदरा बाजार में अरहर दाल की कीमत 178 रुपये और उड़द दाल की 154 रुपये प्रति किलो थी. दाल की चढ़ती कीमतों को लेकर मची हाय-तोबा के बीच उस वक्त तक 13 राज्यों में दाल के जमाखोरों पर छापे पड़ चुके थे और छापे में हासिल 74,846 टन दाल बाजार में आ चुका था. लेकिन, छापेमारी के बावजूद जब दाल के दाम नीचे नहीं आये, तब केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा कि सरकारी राशन दुकान के जरिये लोगों को कम कीमत पर दाल मुहैया कराया जाये.
तब सिर्फ दो राज्यों (आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु) ने पीडीएस के जरिये कम कीमत पर दाल देना शुरू किया. दिल्ली में ‘सफल’ की दुकानों के जरिये दाल कम कीमत पर बंटी जरूर, लेकिन मांगनेवाले हाथ हजार थे, देनेवाले इक्का-दुक्का. करीब छह महीने बाद देश में हालात फिर से वही है. खाद्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक पखवाड़े में अरहर दाल के दाम 18 बड़े शहरों में सात रुपये से 35 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गये हैं.
तर्क दिया जा रहा है कि दाल का उत्पादन कम हुआ है. दोष महाराष्ट्र के दलहन उत्पादक क्षेत्र पर मंडराते सूखे के हालात को भी दिये जा रहे हैं. खबर यह भी आ रही है कि पहले की तरह ही सरकार कम कीमत पर दाल बेचेगी.
हो सकता है कि जल्दी ही छापेमारी और दालों के आयात के बारे में भी सोचा जाये. लेकिन, पहले की ही भांति इस बात की कोई गारंटी नहीं कि दाल के दाम नीचे आ ही आयेंगे. बार-बार एक सी दशा का पैदा होना संकेत करता है कि दाल की कीमतों के मोर्चे पर केंद्र सरकार की कोशिशें कारगर नहीं हैं. मांग और आपूर्ति की कड़ी पर उसका नियंत्रण ढीला है और उत्पादन-भंडारण-वितरण से संबंधित दोषों को वह समय रहते दूर नहीं कर पा रही है.
दाल के दाम नीचे नहीं आये तो इसका सीधा असर देश में जारी कुपोषण की स्थितियों पर पड़ता है. नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि एक तो औसत भारतीय के भोजन में प्रोटीनदायी आहार की मात्रा मानक से कम होती है, दूसरे 58 फीसदी ग्रामीण और 49 फीसदी शहरी आबादी प्रोटीन के लिए मुख्य रूप से दालों पर निर्भर है. ऐसे में अगर सरकार सेहतमंद भारत के लिए सचमुच प्रतिबद्ध है, तो उसे दाल की कीमतों को स्थायी पर तौर पर नीचे लाने के लिए नये सिरे से सोचना होगा.
