बच्चों से न छीनें बचपन

आज के बदलते दौर में हम शिक्षा के प्रति इतने अधिक जागरूक हो गये हैं कि अपने मासूम बच्चों पर इसका बोझ बेधड़क डाले जा रहे हैं. हमें इस बात का ध्यान ही नहीं है कि इन बच्चों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. अच्छे-अच्छे शिक्षाविद द्वारा शिक्षा प्रारंभ करने की मानक उम्र कम […]

आज के बदलते दौर में हम शिक्षा के प्रति इतने अधिक जागरूक हो गये हैं कि अपने मासूम बच्चों पर इसका बोझ बेधड़क डाले जा रहे हैं. हमें इस बात का ध्यान ही नहीं है कि इन बच्चों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.
अच्छे-अच्छे शिक्षाविद द्वारा शिक्षा प्रारंभ करने की मानक उम्र कम से कम पांच वर्ष बतायी गयी है. इसके बावजूद आधुनिक समाज में मानो बच्चों को स्कूल भेजने की होड़ मची हो. एक ओर जहां विद्यालयों में ढाई साल की उम्र से ही बच्चों का दाखिला लिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अभिभावक प्रतिस्पर्धा में बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं. कहा जाता है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला घर है.
प्रथम शिक्षक मां-बाप. फिर हम अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं? क्याें बच्चों को प्ले स्कूल भेजने की जल्दी माता-पिता को है. आखिर हम बच्चों से उनका बचपन क्यों छीन रहे हैं?
माणिक मुखर्जी, सरायकेला-खरसावां

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