समकालीन हिंदी कवि रंजीत वर्मा ने अक्तूबर 2014 से ‘कविता-16 मई के बाद’ मुहिम की शुरुआत की, जिसमें प्रतिरोध की कविता पर ध्यान केंद्रित किया गया था. अहिंदी भाषी राज्यों में भी यह आयोजन हुआ और जनवरी 2016 में ‘प्रतिरोध का पक्ष’ कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ. हिंदी में प्रतिरोधी, प्रगतिशील, मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कविताएं पहले भी कम नहीं लिखी गयी हैं. 16 मई किन कारणों से एक उल्लेखनीय तिथि बनी? सोलहवें लोकसभा चुनाव का परिणाम 16 मई, 2014 को घोषित हुआ.
तीस वर्ष बाद किसी एक राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था. 1984 के बाद यह एक प्रकार का राजनीतिक चमत्कार था. आठवें लोकसभा चुनाव (1984) में भाजपा को दो सीटें मिली थीं. वोट प्रतिशत 7.74 था. कांग्रेस को 404 सीटें मिली थीं और वोट प्रतिशत 49.10 था. तीस वर्ष बाद (2014) कांग्रेस को पांच हिंदी राज्यों- हिमाचल प्रदेश, झारखंड, दिल्ली, उत्तराखंड और राजस्थान तथा पांच अहिंदी राज्यों- गुजरात, तमिलनाडु, गोवा, ओड़िशा और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस को एक सीट भी नहीं मिली.
बसपा, द्रमुक और नेशनल कॉन्फ्रेंस को भी एक सीट नहीं मिली. 16 मई 2014 का इक्कीसवीं सदी की भारतीय राजनीति में एक अहम स्थान है. भाजपा के शासन और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विगत दो वर्ष में स्थितियां सामान्य नहीं रही हैं. ऊपर से सब कुछ प्राय: ठीक-ठीक है, पर देश के मानस में बेचैनी, चिंता व आशंकाएं लगातार उमड़-घुमड़ रही हैं.
क्या भारतीय नागरिक 16 मई, 2016 के बाद एक भिन्न मन:स्थिति से गुजर रहा है? समस्याएं पहले भी कम नहीं थीं, पर अब वे कहीं अधिक विपुल, चिंताजनक और गहरी हैं. भाजपा का दर्शन, चिंतन, विचार और सिद्धांत अपना नहीं है. वह आरएसएस से नाभिनाल बद्ध है. भारतीय संविधान में संघ की आस्था नहीं है. संसदीय लोकतंत्र कॉरपोरेट के लिए अधिक लाभकर नहीं है. अस्सी के दशक के अंत में तीन ‘एम’ (मंडल, मंदिर और मार्केट) का उभरना अचानक नहीं था. पहले मंडल आया, फिर कमंडल या मंदिर और अंत में मार्केट अर्थात बाजार अर्थव्यवस्था. ‘राज्य’ की तुलना में ‘बाजार’ के महत्व-प्रतिपादन पर साठ के दशक में जो ध्यान दिया गया था, वह सोवियत रूस के विघटन, बर्लिन की दीवार के गिरने, उनिभू (उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण) के विस्तार के साथ एकध्रुवीय विश्व से जुड़ कर कहीं अधिक प्रभावशाली-शक्तिशाली बना. 16 मई के बाद भारत एक साथ ‘हिंदुत्व’ की कट्टरता और बाजार की आक्रामकता को झेलेगा. फिलहाल कम ही सही, पर यह गारंटी भाजपा नहीं दे सकती कि वह संविधान की रक्षा करेगी और कॉरपोरेट के बजाय सामान्यजन की सुनेगी. सामान्यजन की चिंता भाजपा को न थी, न है और न रहेगी. प्रचार और विज्ञापन का संबंध ‘मार्केट’ से है और यदि ‘मार्केट डेमोक्रेसी’ जैसी कोई श्रेणी बन सकती है, तो वह बन चुकी है. 16 मई, 2014, संभव है, कुछ वर्षों बाद एक ऐतिहासिक तिथि बन जाये. भाजपा की सुस्पष्ट विचारधारा है, जिससे वह न कभी हटी है, न डिगी है. क्या इस तिथि के बाद भय, हिंसा, आतंक, कट्टरता, असहिष्णुता नहीं बढ़ी है?
‘हिंदू राष्ट्रवाद’ ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ का विरोधी है. हिंदू राष्ट्रवाद अनेक कोणों से उभारा जाता है. जिस प्रकार के बयान नेता, मंत्री, सांसद, विधायक, समर्थक देते हैं, वे राष्ट्र को, संविधान को, संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करते हैं या मजबूत? एक मनोवैज्ञानिक भय और आतंक फैलाया जाता है. क्या भारत 16 मई, 2014 के बाद भयग्रस्त होगा या भयमुक्त? कट्टरपंथ बढ़ेगा या घटेगा? निरंकुश, उन्मादी शक्तियां पीछे हटेंगी या चौक-चौराहों पर, सभा-सम्मेलनों में जाकर हंगामा करेंगी? उन्मादी पूंजी से उन्मादी शक्तियों का संबंध है. हिंदू राष्ट्रवाद भारतीय फासीवाद का रूप ग्रहण करेगा या भारतीय लोकतंत्र के प्रति आस्थावान बनेगा? पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को हमने हाथ जोड़े देखा. उनकी अांखों में आंसू देखे. लोकतंत्र के चारों स्तंभ- ‘विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया’ क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. ये आगामी वर्षों में किस शक्ल में रहेंगे? भारतीय संविधान संघ-चालकों, प्रचारकों, समर्थकों, स्वयंसेवकों के प्रत्यक्ष-परोक्ष हमलों से कितना बचा रहेगा?
16 मई की तिथि का भारतीय राजनीति ही नहीं, भारतीय जनजीवन, भारतीय आदर्श, भारतीय मूल्य की रक्षा-सुरक्षा से भी संबंध है. भारत की जनता की समझ और शक्ति पर अब भी भरोसा है. उसे सपने दिखा कर कुछ समय के लिए भरमाया जा सकता है. कविता का महत्व अपनी जगह है, पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण है भारतीय जनता. 16 मई के फैसले के बाद आगामी वर्षों में जनता क्या फैसला लेगी- नहीं कहा जा सकता. 16 मई के बाद के भारत में उसी का हस्तक्षेप प्रमुख होगा.
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
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