सांसदों-विधायकों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव जब भी आता है, अकसर बगैर किसी बाधा के पास हो जाता है. लेकिन इस बार मामला तनिक उलझ गया है. एक संयुक्त संसदीय समिति ने सिफारिश की थी कि सांसदों का वेतन 50 हजार से बढ़ा कर एक लाख, संसदीय क्षेत्र से संबंधित भत्ता 45 से बढ़ा कर 90 हजार और दफ्तर के खर्च के नाम पर मिलनेवाली राशि भी 45 से बढ़ा कर 90 हजार रुपये होनी चाहिए.
अगर यह वृद्धि होती है, तो सरकारी खजाने पर सालाना 250 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. वित्त मंत्रालय ने इस पर अपनी सहमति जताते हुए प्रस्ताव को मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा, लेकिन खबरों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसदों के वेतन-भत्तों में वृद्धि के ऐसे तरीके और रवैये से सहमत नहीं हैं.
उनकी राय है कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या कैबिनेट सचिव की वेतन-वृद्धि के लिए जो व्यवस्था अपनायी गयी है, कुछ उसी तरह ही व्यवस्था सांसदों के मामले में भी होनी चाहिए. यानी कोई आयोग या बोर्ड बने, जो तमाम जरूरी बातों को ध्यान में रखते हुए एक नियमित अंतराल में सांसदों की वेतनवृद्धि के बारे में फैसले ले. प्रधानमंत्री की यह मंशा बहुत कुछ वामदलों की मंशा के नजदीक है, जो पहले से कहते रहे हैं कि सांसदों की वेतनवृद्धि के लिए अलग से निकाय बनाया जाना चाहिए.
अभी चलन यही है कि सांसदों को वेतनवृद्धि के लिए एक प्रस्ताव भर लाना होता है और भत्ते में वृद्धि के लिए बस एक अधिसूचना भर जारी करनी होती है. इस तरीके में परोक्ष रूप से ही सही, एक मनमानापन झलकता है. अगर लोकतंत्र में नियम से सभी बंधे हैं, तो नियामकों को भी चाहिए कि वेतनवृद्धि के मामले में अपने को एक ऐसे नियम से बांधें, जिसे वे खुद ही न तय करते हों. जब तक ऐसा नहीं होता, उन पर वेतन-वृद्धि के मामले में स्वेच्छाचारिता के आरोप लगते रहेंगे.
जिस देश में राजनीति को जनसेवा का दर्जा हासिल हो और जहां राष्ट्रपति तक ने वेतन के नाम पर बस सांकेतिक राशि लेने का फैसला किया हो, उस देश में ऐसा करना और भी जरूरी हो जाता है. इसलिए सांसदों की वेतनवृद्धि के मसले पर प्रधानमंत्री का एेतराज भारतीय राजनीतिक-संस्कृति के इसी पक्ष को याद दिलाने का एक सराहनीय कदम है.
