हर साल की तरह इस बार भी हमने मजदूर दिवस मनाया़ लेकिन, शहर के मुख्य चौक-चौराहों पर सुबह-सुबह रोजगार को टकटकी लगाये, मैले-कुचैले कपड़े पहने नजर आनेवाले लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है? यह प्राणी रोज कुआं खोदता और पानी पीता है़
जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन पूरा परिवार फांका करता है़ हाड़-तोड़ मेहनत और अगले दिन रोजगार न मिलने की आशंकाइन्हें उम्र से पहले ही बूढ़ा बना देती है़ बड़े-बड़े भवन, खेतों, भट्ठों, कारखानों में जी-तोड़ श्रम करनेवाले ये लोग गुमनामी में जीने को विवश हैं. उनके पसीने की हर बूंद का हक उन्हें मिले, तभी मजदूर दिवस की सार्थकता है.
मनीष सिंह, ई-मेल से
