बंगाल के बाबूघाट का गंगासागर कैंप

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) गंगासागर के रेतीले तट पर हर साल मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए देश-विदेश के लाखों आस्थावान नर-नारी जुटते हैं. इस मेले में आये लोग भाषा और क्षेत्र की दीवार को लांघ कर आते हैं. उन्हें यहां की स्थानीय बांग्ला भाषा नहीं आती, इसलिए वे अपने पूर्वजों […]

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

गंगासागर के रेतीले तट पर हर साल मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए देश-विदेश के लाखों आस्थावान नर-नारी जुटते हैं. इस मेले में आये लोग भाषा और क्षेत्र की दीवार को लांघ कर आते हैं. उन्हें यहां की स्थानीय बांग्ला भाषा नहीं आती, इसलिए वे अपने पूर्वजों की भांति टूटी-फूटी हिंदी से ही काम चलाते हैं. समुद्र की समशीतोष्ण जलहवा उन्हें अपने अंकवार में भर कर उस शीतलहरी से बचाती है, जो प्रयाग के संगम तट पर माघ मास में स्नानार्थियों को ङोलनी पड़ती है. विभिन्न प्रांतों की लोक-संस्कृतियों का ऐसा संगम बड़े सौभाग्य से ही देखने को मिलता है. वहां तक पहुंचने के लिए यात्रियों को पहले कोलकाता में बाबूघाट पहुंचना होता है. वहां से काकद्वीप तक लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की यात्राबस से करनी होती है. उसके बाद सुंदरवन के किनारे-किनारे नाव से चल कर सागरद्वीप पहुंचना होता है. उस पार फिर बस की सेवा लेकर मुख्य सागरद्वीप तक जाना होता है. जब लाखों का हुजूम इकट्ठा हो, तब यात्र में इतनी फेरबदल काफी कष्टदायक होती है. राज्य सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भरसक सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद यात्रियों को अनेक कष्ट उठाने ही पड़ते हैं, जिसके कारण यह लोकोक्ति प्रचलित हुई कि ‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार.’ बहुत कम ही लोग एक बार गंगासागर की यात्र के कष्टों को ङोलने के बाद दुबारा यहां आना चाहते हैं.

यह यात्रा तब और कष्टदायक हो जाती है, जब किसी भोले-भाले यात्री की कोलकाता आकर हावड़ा स्टेशन पर जेब कट जाती है. गंगासागर मेले के दौरान अपराधियों का गिरोह और सक्रिय रहता है. स्टेशन से उतरते ही यात्रियों को अपनी गिरफ्त में लेकर उनका सब कुछ लूट लेना इन गिरोहों का प्रमुख उद्यम है. यदि सौभाग्य से कोई यात्री हावड़ा स्टेशन से बच कर निकल जाये तो वह कोलकाता शहर में लुट जाता है और कान पकड़ लेता है कि अब कभी गंगासागर नहीं आयेगा.

गंगासागर के यात्रियों की इस विषम समस्या को हल करने के लिए कोलकाता में अपने उद्यम के बल पर झंडा गाड़नेवाले समाजसेवी आगे आये और बाबूघाट पर कैम्प लगा कर तीर्थयात्रियों की सेवा करने लगे. चूंकि उत्तर प्रदेश और बिहार के यात्री अधिक संख्या में आते हैं और कोलकाता में इन प्रदेशों के लोग भी अपेक्षाकृत अधिक रहते हैं, इसलिए शुरुआत अपने-अपने इलाके के तीर्थयात्रियों को आवास-भोजन की बुनियादी जरूरत को पूरा करने के लिए कैम्प लगाने से हुई. धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों के समाजसेवी भी आगे आये और देखते ही देखते बाबूघाट पर शिविरों का अस्थायी नगर बस गया. स्थिति यहां तक आ गयी कि नगर निगम ने एक निश्चित संख्या के बाद नये शिविर लगाने की अनुमति देना बंद कर दिया.

बाबूघाट का यह अस्थायी तंबुओं का नगर 10 जनवरी के आसपास बसना शुरू होता है और मकर संक्रांति के दो दिन बाद उखड़ जाता है. इन कैम्पों में यात्रियों के सोने के लिए पुआल और दरी की सेज बिछी रहती है. साथ ही, सुबह से लेकर मध्यरात्रि तक तीर्थयात्रियों के लिए चाय, नाश्ता और शुद्ध-स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था रहती है. इसके अलावा, बीमार यात्रियों की चिकित्सा के लिए चिकित्सक और दवाएं हमेशा उपलब्ध. आवास-भोजन-चिकित्सा सब कुछ नि:शुल्क! इस घोर कलियुग में जब बेटा भी बाप को मुफ्त में नहीं रखना चाहता, कलकत्ता के धर्मप्राण उद्यमी सात दिनों के लिए बाबूघाट पर सत्युग उतार देते हैं. सभी कैम्प अपने यहां उपलब्ध गरम-गरम भोजन का वर्णन माइक पर इस रोचक ढंग से करते हैं कि यात्री उनके यहां ही आयें. नि:शुल्क भोजन कराने के लिए कैम्पों के बीच यह होड़ देख कर मन प्रफुल्लित हो उठता है और सनातन धर्म के पालकों के सात्विक त्याग की इस परंपरा पर गर्व से छाती फूल उठती है.

बाबूघाट के गंगासागर कैम्प की विशेषताओं को बारीकी से देखने-समझने का पहला मौका मुङो तब मिला था, जब ‘सुल्तानपुर समाज’ के आयोजकों ने मुङो कैम्प के उद्घाटन के अवसर पर एक साहित्यकार के रूप में आमंत्रित किया था. उस समय बाबू रतनपाल सिंह पूरे जोश के साथ अपने इष्ट-मित्रों के साथ यह सेवा शिविर लगाते थे. वहीं जाकर पता लगा कि वित्त से रहित मैथिल समाज की भी एक छोटी-सी संस्था ‘मिथिलांचल सेवा समिति’, ‘जयभारत नागरिक सेवा समिति’ के साथ कैम्प लगाती है. बाद में उसके सचिव विवेकानंद झा ने मुझेएक तरह से भावुकता में बांध कर समिति का अध्यक्ष भी बना दिया. उस दौरान मैंने देखा कि लोग किस तरह समाज से खाने-पीने की चीजें मांग कर लाते हैं और अपने खर्च से हलवाई रख कर खाना तैयार करवाते हैं और चिर -अपरिचित यात्रियों को पूरी श्रद्धा और उत्साह से भोजन कराते हैं. जिन यात्रियों की जेब कट जाती है, उनके सागरद्वीप आने-जाने और घर लौटने के लिए रेल या बस टिकट की व्यवस्था भी की जाती है.

दान की महिमा ऐसी कि व्यवसायी लोग आधी-आधी रात को कैम्प में आकर ट्रालियों से सामान उतार जाते हैं. जो लोग धन से सहायता नहीं कर पाते, वे तन से ही सेवा में जुटे रहते हैं. इन शिविरों के आयोजक रेलवे स्टेशन पर भी यात्रियों को समुचित मार्गदर्शन के लिए अपने युवा स्वयंसेवक भेजते है. मेरे कलकत्ता छोड़ने के बाद ‘मिथिलांचल सेवा समिति’ का नाम बदल कर ‘विद्यापति स्मारक मंच’ हो गया, मगर आज भी यह छोटी-सी अल्पप्राण समिति जयभारत नागरिक सेवा समिति और सक्सेना सेवा समिति के साथ मिल कर गंगासागर कैम्प में तीर्थयात्रियों की सेवा पूरी निष्ठा से कर रही है. इन स्वयंसेवकों को इन दिनों हजारों यात्रियों की नि:स्वार्थ सेवा में जो आनंद मिलता है, वह अनिर्वचनीय है.

इस साल एक पारिवारिक आपदा आ जाने के कारण मैं कोलकाता नहीं जा पाऊंगा, मगर पूरे पांच दिनों तक मेरा मन बाबूघाट के गंगासागर कैम्प में ही भरमता रहेगा. क्योंकि वहां मैंने विभिन्न क्षेत्रों के समर्पित समाजसेवियों के साथ दरिद्रनारायण की सेवा में हाथ बंटाया है और असली भारत की आत्मा को जाना है. ऐसे भी मौके आये, जब लगा कि भंडार रात भर में खत्म हो जायेगा और कल की चिंता सताने लगती, मगर शिविर प्रबंधकों का ईश्वर की अनुकंपा पर ऐसा अटूट विश्वास था, जो हमें कभी हताश नहीं होने देता था. आज रतनपाल सिंह, कमलाप्रसाद जायसवाल जैसे प्रतापी दानवीर के दिवंगत हो जाने से बाबूघाट गंगासागर शिविर की ऊर्जा क्षीण हुई है, पर अगली पीढ़ी हमें आश्वस्त करती है कि यह परंपरा आगे बढ़ती रहेगी. कल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन है. जो लोग उनके निर्देशों के अनुसार दरिद्रनारायणों की सेवा करते हैं, वही स्वामी जी के सच्चे अनुयायी हैं.

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