इनसान को जीवन में कभी न कभी आटे-दाल का भाव मालूम होता ही होगा. अब उसके साथ गैस भी जुड़ गया है. इस भाव के उतार-चढ़ाव में आम आदमी को फुरसत कहां कि सोचे कि उसकी भलाई का ख्याल रखने के लिए ऊपरवाले के अलावा दो सरकारें भी हैं. दिल्ली में बैठी सरकार जब सुविधाओं का पिटारा खोलती है तो खूब ढिंढोरे पिटते हैं. मगर जब सुविधा नाम की चीज लोगों तक आती है तब शुरू होता है असुविधाओं का खेल.
रसोई गैस इन्हीं सुविधाओं में एक है. इस सुविधा में सब्सिडी है, कोटा है, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, केवाइसी है, आधार है, बैंक खाता है और ना जाने क्या-क्या है! जिन लोगों को छात्र जीवन में भी सामान्य ज्ञान में दिलचस्पी नहीं थी, वे भी आजकल अखबारों मे गैस की हर खबर पर नजर रखने लगे हैं. शहर के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम से जुड़े कुछ फीसदी लोग खुशनसीब हैं जिनकी सुविधाओं में कूपन के लिए डीलर का चक्कर लगाना और कुछ ज्यादा पैसे दे कर सिलिंडर खरीदना आदि शुमार है.
तीन दिनों में बैंक एकाउंट में आया पैसा और मोबाइल पर आया मेसेज अनायास थोड़ी खुशी देता है, मगर यह खुशी स्थायी नहीं होती. यह तब काफूर हो जाती है जब पता चलता है कि एलपीजी पर लगने वाला 5 फीसदी टैक्स, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम में 12 से 15 फीसदी हो जाता है. गैस की कीमत बढ़ने के साथ वैट प्रतिशत भी बढ़ता जाता है. केंद्र सरकार राज्य को विचार करने का अनुरोध कर चुकी है. जबकि गैस कंपनी के कार्यक्षेत्र में वैट नहीं है और डीलर ‘नन ऑफ आवर बिजनेस’ कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं. सुविधा के नाम पर उपभोक्ता के 30 से 50 रुपये प्रति सिलिंडर तक नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
एमके मिश्र, रांची
