राजनीतिक तमाशे पर कौन करेगा चोट!

।। पुण्य प्रसून वाजपेयी।। (वरिष्ठ पत्रकार) उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री-विधायक बुधवार को पांच देशों की यात्र पर रवाना हुए और बुधवार देर रात कर्नाटक सरकार के मंत्री-विधायक तीन देशों की यात्रा कर वापस लौटे. इसी दिन दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मीडिया से कहा, बदलाव के लिए जरूरी है कि सरकार और मंत्री […]

।। पुण्य प्रसून वाजपेयी।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री-विधायक बुधवार को पांच देशों की यात्र पर रवाना हुए और बुधवार देर रात कर्नाटक सरकार के मंत्री-विधायक तीन देशों की यात्रा कर वापस लौटे. इसी दिन दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मीडिया से कहा, बदलाव के लिए जरूरी है कि सरकार और मंत्री अपनी बहुसंख्य जनता के जीवन जीने के तरीकों से इतर न सोचें, यानी उनमें सादगी जरूरी है. लेकिन उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के मंत्री-विधायकों ने अपनी यात्र के संबंध में संसदीय लोकतांत्रिक परिस्थितियों की दुहाई देकर इस सच से पल्ला झाड़ लिया कि उत्तर प्रदेश में दंगों का दर्द बरकरार है और कर्नाटक में किसान सूखे की मार से परेशान हैं. यहां कुछ अहम सवाल उभरते हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का सच क्या है और क्यों लोकतंत्र का जाप करनेवाली पारंपरिक राजनीति को बदलने का वक्त आ गया है?

इन सवालों को समझने के लिए जरा मंत्री-नेताओं के आम लोगों से दूर होते सरोकार को परखें. इंग्लैंड, नीदरलैंड, टर्की, ग्रीस और यूएई की यात्रा पर गये यूपी सरकार के मंत्रियों पर कुल खर्च डेढ़ करोड़ रुपये का है, तो आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फिजी घूम कर लौटे कर्नाटक के मंत्री-विधायकों पर कुल खर्च एक करोड़ 35 लाख रुपये का. देश के हर राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में विदेश यात्रा को कमोवेश न सिर्फ महत्वपूर्ण माना गया है, बल्कि सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाने का अधिकार भी राज्य से लेकर केंद्र सरकार और हर मंत्रालय को दिया गया है. देश के सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्री-मंत्री-विधायकों की टोली की विदेशी यात्राओं पर हर बरस खर्च तकरीबन 775 करोड़ रुपये का है. वहीं केंद्र सरकार के तमाम मंत्रलय और सांसदों की टोली की यात्राओं पर हर बरस करीब 625 करोड़ रुपये खर्च होता है. यानी सालाना 1400 करोड़ राजनेताओं की विदेश यात्राओं पर खपता है. इसे सिलसिलेवार तरीके से बांटें, तो राज्यों के मंत्री-विधायकों का स्टडी टूर खर्च 175 करोड़ रुपये का है. केंद्र के मंत्रियों के स्टडी टूर का खर्च 200 करोड़ का है. राष्ट्रीय नेताओं की विदेश यात्राओं पर सालाना खर्च 425 करोड़ और राज्यों के नेताओं का विदेश यात्रा खर्च 600 करोड़ रुपये आता है. इसमें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की यात्राओं का खर्च शामिल नहीं है. वैसे मनमोहन सिंह ने 2004 में सत्ता संभालने के बाद अक्तूबर, 2013 तक 70 विदेश यात्राएं की हैं, जिन पर 650 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं.

यहां एक सवाल उठ सकता है कि विदेश यात्रा करने में परेशानी क्या है और अपने ही देश में रह कर कोई क्या सुधार कर सकता है? लेकिन आम आदमी पार्टी की राजनीति को समझ रहे लोगों का रुझान क्यों केजरीवाल की तरफ झुका, उसका एक बड़ा सच यह भी है कि ज्यादातर राजनेता देश की पूंजी से अपनी रईसी जताने-दिखाने में जुटे हैं. कांग्रेस और बीजेपी ही नहीं, सपा-बसपा सरीखे क्षेत्रीय दलों के नेता भी अपने प्रोफाइल में यह लिखना शान समझते हैं कि उन्होंने कितने देशों की यात्र बतौर मंत्री, सांसद या विधायक की है. कोई यह जिक्र नहीं करता कि किस मुद्दे के आसरे उसने जनता के पैसे पर सरकारी यात्रा की. बीते 20 बरस में नेताओं-मंत्रियो ने देश के हर उस मुद्दे को लेकर विदेश यात्रएं की हैं, जिन मुद्दों पर देश में सुधार की जरूरत है. इस पर देश के करीब 20 लाख करोड़ रुपये खर्च हो जाने के बावजूद तमाम मुद्दों का बंटाधार भी इसी दौर में हुआ है. सबसे ज्यादा विदेश यात्राएं शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सौर ऊर्जा, सिंचाई व्यवस्था दुरस्त करने को लेकर हुईं और संयोग देखिये कि इन्हीं मुद्दों पर आम आदमी पार्टी राजधानी दिल्ली में सत्ता में आयी है. यही मुद्दे हर राजनीतिक एलान के केंद्र में रहे हैं.

वास्तव में, देश में चुनी हुई सरकारों के खिलाफ आम आदमी द्वारा राजनीति में दखल देने की असल दस्तक यहीं से शुरू हुई है. और ध्यान दें तो केजरीवाल ने जनता की भागीदारी से राजनीति के तौर-तरीकों में उसी गुस्से को राजनीतिक तौर पर जगह दी है, जो अब तक हाशिये पर थी. मुजफ्फरनगर दंगों के दर्द को निपटाये बिना राज्य सरकार के मंत्री विदेश नहीं जा सकते, यह आवाज यूपी में नहीं उठेगी. लेकिन दिल्ली में किसी आम आदमी को कोई परेशानी है तो उसे दूर करने की जिम्मेवारी लेने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल तैयार हैं. तो सवाल तीन हैं. पहला, क्या सत्ताधारियों की रईसी पर लगाम खुद सत्ताधारियों को ही लगानी होगी? दूसरा, क्या राजनीति के तौर-तरीके आम आदमी से जुड़ेंगे तो सत्ता रईसी नहीं करेगी? तीसरा, क्या लोकतांत्रिक तौर-तरीके सत्ता को बदलने पर मजबूर कर देंगे? दिल्ली के चुनावी नतीजे आने के बाद राहुल गांधी ने खुली पंचायत शुरू की और नतीजों के तुरंत बाद कहा कि वह साल भर पुरानी पार्टी से भी सीखेंगे. क्या इसका यह मतलब निकाला जाये कि वाकई आनेवाले दौर में सत्ताधारी जनता के दर्द से जुड़ेंगे? या जनता के दर्द को दूर करने के तरीके जानने के लिए स्टडी टूर का बहाना बना कर विदेश की सैर पर निकल जायेंगे?

असल में पारंपरिक राजनीति का सियासी मिजाज बदल इसीलिए रहा है, क्योंकि सत्ताधारियों ने आम आदमी से सरोकार रखना छोड़ दिया है. इसीलिए एक तरफ इंग्लैंड, नीदरलैंड, टर्की, ग्रीस और यूएई की चकाचौंध है, मस्ती से भरपूर समाज है, गरीबी-मुफलिसी से दूर विकसित देशों की संसदीय राजनीति का गुदगुदापन है; तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की त्रासदी है, दंगों से प्रभावित मुजफ्फरनगर का रुदन है, कर्नाटक का बेहाल किसान है. इन दो चेहरों को क्या एक साथ देखा जा सकता है? एक तरफ खाता-पीता समाज है, तो दूसरी तरफ भूख है. एक तरफ अधिकतम पाने की चाहत है, तो दूसरी तरफ न्यूनतम के जुगाड़ की जद्दोजहद. इनमें कोई मेल नहीं है और मेल हो जाये, इसके लिए भारतीय समाज उसी राजनीतिक सत्ता पर निर्भर है जो चकाचौंध की राजनीति पर भी भारी है.

तो कैसे सत्ता की उस रईसी को लोकतंत्र के राग से जोड़ा जा सकता है, जिसे मंत्री से लेकर संतरी तक गुनगुनाते रहे हैं? कैसे माना जाये कि चार्टर्ड विमान से पांच देशों के 17 पर्यटन स्थलों की 18 दिनों तक सैर के बीच यूपी सरकार के मंत्री स्टडी करेंगे कि संसदीय राजनीति को किस तरह मजबूत किया जा सकता है? कैसे गरीबी, मुफलिसी वाले समाज को भी चकाचौंध में बदला जा सकता है? और फिर यह सवाल कौन उठायेगा कि क्यों मुजफ्फरनगर के राहत कैंपों में डेढ़ सौ रुपये के कंबल तक नहीं हैं? यह सवाल कौन करेगा कि अंगरेजी का विरोध करनेवाले मुलायम सिंह यादव की सरकार के मंत्री स्टडी टूर के लिए इंग्लैंड क्यों जा रहे हैं? तो 2014 का आम चुनाव इस राजनीति में सेंध लगायेगा या नहीं, इसका इंतजार कीजिये.

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