।। पुष्यमित्र।।
(पंचायतनामा, रांची)
हमारा देश पटाखा प्रधान देश है. आजादी से लेकर अब तक देश के निर्माताओं ने जगह-जगह पटाखों की स्थापना की है, ताकि लोग अपनी जरूरत के अनुसार जब चाहे पटाखे चला सकें और धमाके का मजा ले सकें. ये अलग बात है कि देश में कुछ लोग पटाखा चलाना जानते हैं और कुछ लोग धमाका होने पर घबराने और शोर मचाने के एक्सपर्ट हैं. हाल ही में एक विद्वान सज्जन ने कश्मीर नाम के पटाखे के पलीते में आग लगा दी, इससे पहले कि पटाखा फूटता देश के तमाम राष्ट्रवादियों ने शोर मचा दिया कि यह पटाखा देश को तहस-नहस कर देगा. कहते हैं, कश्मीर का पटाखा कई आवाज वाला है. कुछ दिन पहले एक देशभक्त टाइप राष्ट्रनेता ने भी इसके पलीते में आग लगायी थी और उस बार दूसरे टाइप के लोगों ने देश के तहस-नहस होने की आशंका जतायी थी. वैसे अब तक का अनुभव यही है कि ऐसे पटाखों से देश को कोई खतरा नहीं होता. ये दीवार बम की तरह सिर्फ आवाज करते हैं.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ कश्मीर बम दमदार है. अपने देश में तो शौचालय के नाम तक पर बम बने हुए हैं और उस बम की भी यह खासियत है कि उसे दोनों तरफ के लोग एक दूसरे पर फेंक सकते हैं. अब अगर होशियार बंदा हुआ, तो कैच करके वापस फेंकनेवाले की तरफ भी उसे उछाल सकता है. कुछ पटाखे धार्मिक किस्म के होते हैं और कुछ देशभक्ति टाइप. मगर दोनों का मकसद भावनाओं के बारूद को सुलगाना होता है. वैसे कुछ पटाखे गरीबी के खिलाफ भी होते हैं. इन्हें अक्सर सरकारी नेता फोड़ते हैं, जैसे पांच रुपये में भरपेट भोजन खाया जा सकता है. गरीब दो सब्जी खाने लगे हैं इसलिए महंगाई बढ़ गयी है. कुछ पटाखे मीडिया फोड़ती है, खास तौर पर अगर कहीं 32 लाख का शौचालय बन जाये या कोई मुख्यमंत्री दो बंगले मांग ले.
बहरहाल, वैसे तो इन पटाखों का जाहिर तौर पर न कोई नुकसान है न कोई लाभ. यह बस लोगों को जगाता है और बहस के लिए उकसाता है. मगर ऐसा भी नहीं है कि बहस के बाद कोई नतीजा सामने आ जाये. नतीजा आने से पहले एक्सपर्ट इसे बुझा कर रख लेते हैं, ताकि आनेवाले वक्त में इसे दुबारा चलाया जा सके. ज्यादा से ज्यादा पलीता जलता है, तो पलीते को बदलने की गुंजाइश रह जाती है. कई दफा तो पलीते के आधा जलने पर भी पटाखे को बुझा कर रख लिया जाता है. इससे देश के पटाखा प्रधान होने की साख बची रहती है.
वैसे कुछ शोधार्थी कहते हैं कि ये पटाखे बड़े उपयोगी होते हैं. खास तौर पर जब बड़े लोगों को घर में चैन से कोई काम करना होता है, तो ये घर के बाहर पटाखे चलवा देते हैं. ताकि जनता पटाखों के आसपास शोर करती रहे और वे अपना काम बेफिक्र होकर अंजाम दे सकें. इस देश की नियति को तय करनेवाले कई महत्वपूर्ण फैसले बिना शोर- शराबे के इसी वजह से हो पाते हैं, क्योंकि हमारा देश पटाखा प्रधान है.
