।। शुजात बुखारी।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
इसे शायद बहुत बड़ी पहल नहीं कहा जा सकता, लेकिन भारत और पाकिस्तान के सैन्य ऑपरेशंस के महानिदेशकों (डीजीएमओ) के बीच बैठक ने निश्चित तौर पर दोनों ही पक्षों के बीच के गतिरोध को तोड़ने में मदद की है. 14 वर्षो के बाद पहली बार आमने-सामने बैठ कर शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने न केवल बिगड़े संबंधों को नयी लीक पर डाला है, बल्कि दोनों प्रधानमंत्रियों- मनमोहन सिंह और नवाज शरीफ के बीच न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की बैठक के दौरान हुए वायदे को भी निभाया है, भले ही यह तीन महीने की देरी से हुआ हो.
यह संबंधों में एक नयापन भरने सरीखा है, जो हर मंगलवार हॉटलाइन पर बातचीत से बढ़ते हुए वाघा में मंगलवार को सशरीर बैठक तक पहुंचा. 2013 में पूरे वर्ष नियंत्रण रेखा पर उग्र और सघन संघर्ष के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा. यह बैठक इस माहौल में थोड़ी समझदारी घोल सकती है. इस बैठक के साथ ही, जिसमें दोनों पक्ष संघर्षविराम को जारी रखने पर सहमत हुए, हम उम्मीद कर सकते हैं कि 2014 में भारत और पाक सद्भावपूर्ण संबंधों को कायम रखेंगे. भारतीय सेना के एक प्रवक्ता के मुताबिक यह बैठक- सकारात्मक, दोस्ताना और रचनात्मक वातावरण में हुई. ‘दोनों ही डीजीएमओ ने युद्धविराम और नियंत्रण रेखा की पवित्रता बनाये रखने और मौजूदा व्यवस्था को और सक्रिय करने पर सहमति जतायी है’. उन्होंने निकट भविष्य में ब्रिगेडियर स्तर की फ्लैग मीटिंग की भी संभावना जतायी. इसके अलावा दोनों ही पक्ष वातावरण को और सहज बनाने के कदम उठाने पर सहमत हुए हैं.
डीजीएमओ की बैठक संबंधों में अचानक से बदलाव भले न लाये, लेकिन इसमें नियंत्रण रेखा के आसपास स्थिति सुधारने की भरपूर क्षमता है. न्यूयॉर्क में सिंह और शरीफ के बीच की बैठक पर भी, जब वे उच्चस्तरीय संपर्क फिर से बहाल करनेवाले थे, जम्मू में एक दिन पहले हुए जुड़वां हमलों की काली छाया पड़ गयी थी. हालांकि, इसके बावजूद वे मिले, भले ही उनकी ‘बॉडी लैंग्वेज’ सकारात्मक नहीं थी. डीजीएमओ मीटिंग उस बैठक से निकला एकमात्र फल था और उसको मूर्त्त रूप देना एक सकारात्मक कदम है.
पहले की ‘समग्र’ वार्ता, जिसे अब ‘व्यापक’ वार्ता का नाम दिया गया है, मुंबई के 2008 हमलों के बाद से ही खटाई में थी. इस बात से इनकार नहीं कि इसे कुछ स्तर तक फिर से बहाल किया गया था, पर यह गति आगे की दिशा में नहीं थी. मौजूदा समय में जहां पाकिस्तान अपने आंतरिक द्वंद्व से जूझ रहा है, वहीं भारत की घोटालों से लदी संप्रग सरकार को इसकी बहुआयामी असफलताओं के लिए काफी आलोचना ङोलनी पड़ रही है. यह एक तथ्य है कि दिल्ली की किसी सरकार को विपक्ष को भरोसे में लेकर ही पाकिस्तान के साथ संबंध-सुधार के कदम बढ़ाने होंगे, लेकिन ऐसी किसी ‘आवश्यकता’ के लिए पूरी प्रक्रिया को बंधक नहीं बनाया जा सकता. पिछले दो वर्षो से दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात नहीं हुई है और व्यापार के मोरचे पर मिले ‘फायदों’ को रद्दी में फेंक दिया गया है. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से ही आसान वीजा नियमों के फैसले भी असफल हो गये और शांति प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सका.
‘आतंकवाद’ के ऊपर, खासकर मुंबई हमलों के बाद भारत की चिंता अच्छी तरह से समझी जा सकती है. दोषियों को न्याय के दरवाजे तक लाने के लिए पाकिस्तान का सहयोग बहुत जरूरी है. इसलामाबाद को त्वरित न्याय दिलवाने में शीघ्रता करनी चाहिए, हालांकि सबूतों के बारे में आरोप-प्रत्यारोप जारी है. यहां यह समझना जरूरी है कि जब नयी दिल्ली मुंबई हमलों के बाद वार्ता प्रक्रिया को शुरू करने पर सहमत है, तो इसकी प्रगति को विवाद का विषय नहीं बनाया जाये.
पाकिस्तान में एक नव-निर्वाचित प्रजातांत्रिक सरकार के चुनाव के बाद, अब नयी दिल्ली में आम चुनाव होने हैं और यहां नयी हुकूमत का इंतजार किया जा रहा है. तब तक ‘वेट एंड वाच’ की नीति ही चलेगी. नवाज शरीफ ने भारत के साथ शांति के ‘वायदे’ के साथ अपना कार्यकाल शुरू किया है. पहले कुछ महीनों तक तो वे 1999 के लाहौर-घोषणापत्र का जिक्र करते रहे. वे फिर से उसी जगह से शुरुआत करने की बात करते रहे, जहां उन्होंने वार्ता को छोड़ा था. लेकिन, जाहिर तौर पर दिल्ली से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलनेवाला था. यह शायद संकट से ग्रस्त मनमोहन सिंह सरकार के भारतीय जमीन से आखिरी ‘बम या बंदूक’ साफ नहीं होने तक, पाकिस्तान के साथ बातचीत नहीं करने के कट्टर रुख की उपज था. मुंबई का फैसला आने तक हरेक चीज को उसका बंधक बनाना भारत की तरफ से समझदारी भरा कदम नहीं कहा जा सकता है. भारत के कंधों पर दक्षिण एशिया में शांति कायम रखने की एक बड़ी जिम्मेवारी है. जहां एक तरफ नवाज शरीफ नागरिक अधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत हैं, वहीं उनके असली ‘इरादों’ की पहचान उनके प्रत्यक्ष बयानों से ही करनी होगी. उनमें हाल तक कोई विचलन नहीं दिखा, सिवाय ‘चौथे युद्ध’ वाले उनके हालिया बयान के, जिसे बाद में उनके कार्यालय ने नकार दिया.
अगर, मुशर्रफ युग में शांति-प्रक्रिया से जुड़े लोगों की मानें, तो कश्मीर पर चार-सूत्री फॉमरूला भी दिल्ली की तरफ से हो रही अनपेक्षित देरी की वजह से ही उनके जाने तक कार्यान्वित नहीं किया जा सका. नवाज शरीफ अपने शासन को ‘नागरिक’ रंग देने में ‘सफल’ होते दिख रहे हैं और सेना के शीर्ष पद पर जिस आसानी से नयी नियुक्ति हो गयी, वह नवाज शरीफ की मजबूती को दिखाता है. इसका मतलब है कि नयी दिल्ली को भी शांति की ओर बढ़ने का यह मौका नहीं खोना चाहिए. अगर नवाज शरीफ खुद असफल होते हैं, तो इसका ठीकरा उनके ही सिर फूटेगा. स्थायी शांति प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए गंभीर प्रयास जारी रहें, यह नयी दिल्ली के हित में है. हालांकि, नयी सरकार के लिए इंतजार अपरिहार्य है, पर डीजीएमओ की बैठक जैसे प्रयास दोनों ही पक्षों की तरफ से जरूर जारी रहने चाहिए. यह मई के बाद एक व्यापक प्रक्रिया के लिए जमीन तैयार करने का काम करेगा. मई में चुनाव के बाद जो भी दिल्ली में सत्ता में आयेगा, उसके लिए पाकिस्तान के साथ शांति और कश्मीर सहित सभी समस्याओं पर एक सम्मानित उपाय खोजना अनिवार्य होगा. हल आखिरकार पाकिस्तान से अधिक भारत के हित में हैं.
अनुवाद: व्यालोक
