अभी झारखंड में शिक्षक नियुक्ति में भाषा का मुद्दा गरमाया हुआ है. भोजपुरी और मगही को शिक्षा मंत्री ने टेट से हटा दिया है, तर्क यह है कि ये झारखंडी भाषाएं नहीं हैं. लेकिन सवाल यह है कि उर्दू भाषा का भी झारखंड से कोई निकट संबंध नहीं है. अगर देखा जाए तो उर्दू की लिपि फारसी है. इसकी शब्दावली भारतीय से ज्यादा फारसी, अरबी, तुर्की है, फिर इसका झारखंड से क्या संबंध? झारखंडी मुसलमान भी उर्दू नहीं बोलते हैं.
वे पूर्ण रूप से झारखंडी और झारखंडी भाषाएं बोलते हैं. उर्दू भाषा राज्य पर थोपी गयी है. उर्दू को दूसरी राजभाषा का दरजा देकर राज्य सरकार झारखंडी भाषाओं के साथ अन्याय कर रही है. झारखंड की कई भाषाएं सरकारी संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रही हैं, जरा उन पर भी ध्यान दिया जाए. यहां तो अपनों पर सितम और गैरों पर करम वाली स्थिति है.
राजीव रंजन, ई-मेल से
