कहते हैं नीति अच्छी हो तो नियति भी अच्छी ही होगी. यही बात केजरीवाल पर लागू होती है. इसी कारण आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल की और भारतीय राजनीति के स्थापित बड़े-बड़े राजनीतिक दलों को पराजित होना पड़ा. देखा जाए तो आम आदमी पार्टी आज आम आदमी की भावना का प्रतीक बन कर उभरी है.
लोग भ्रष्टाचार से ऊब गये हैं, नेताओं और नौकरशाहों की मनमानी कार्यशैली से भी लोग बेहद नाराज हैं. इसके अलावा जानलेवा महंगाई ने भी लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. देश की घिसी-पिटी राजनीति में लोगों को अपनी समस्याओं का समाधान नजर नहीं आता है. इसीलिए आम लोगों ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी का जमकर साथ दिया. ‘आप’ के दर्पण में लोगों को अपनी जिंदगी की तसवीर सुंदर होती दिखी, इसलिए भी लोगों ने उसी दर्पण में अपना चेहरा देखना अधिक पसंद किया. हालांकि एक बात यह भी है कि भारतीय राजनीति को व्यापक तौर पर देखा जाए तो आम लोगों को इतना भी प्रसन्न नहीं हो जाना चाहिए कि अब उनकी समस्त समस्याओं का समाधान यकायक हो जाएगा.
भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी के उभार की तरह कई बार परिवर्तन का रुझान दिखता रहा है, जो समय के साथ विलीन या ओझल हो जाता है. यदि ऐसा नहीं होता तो तरह-तरह की क्षेत्रीय पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद भारतीय राजनीति दो प्रमुख राजनीतिक दलों के ही इर्द-गिर्द नहीं घूमती रहती. इसलिए आम आदमी पार्टी पर लोगों की अपेक्षाओं का भारी भार है और उन पर खरा उतरने की चुनौती भी. इस नवजात दल के लिए आम आदमी की आकांक्षाओं का सम्मान और उनकी समस्याओं का समाधान कर पाना आसान नहीं होगा.
सूरज भान सिंह, गोमिया, बोकारो
