।। राजीव रंजन झा ।।
(संपादक, शेयर मंथन)
हरी सब्जियों के दाम तो ठेलेवाले अब किलो में बताने के बजाय एक पाव का भाव बताने लगे हैं. जब वे किसी सब्जी का दाम 10 रुपये पाव यानी 40 रुपये किलो बताते हैं, तो जरा राहत महसूस होती है कि अरे, यह सब्जी जरा सस्ती हो गयी!
भारत का शेयर बाजार आरबीआइ और अमेरिकी फेडरल रिजर्व से जिन दो खास खबरों का इंतजार कर रहा था, उनमें से एक ने उसे बखूबी सकारात्मक ढंग से चौंकाया है. बाजार में लगभग आम राय थी कि हाल में जिस तरह से उपभोक्ता महंगाई दर (सीपीआइ) के आंकड़े काफी बढ़ कर आये और उसके बाद थोक महंगाई दर (डब्ल्यूपीआइ) में भी वृद्धि हुई, उसके मद्देनजर आरबीआइ गवर्नर रघुराम राजन एक बार फिर से आरबीआइ की नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि करने के लिए विवश होंगे.
ज्यादातर लोगों का मानना था कि आरबीआइ अपनी रेपो दर में 0.25 प्रतिशत अंक (25 बीपीएस) की वृद्धि करेगा और कुछ लोग तो मान रहे थे कि यह वृद्धि 0.5 प्रतिशत अंक (50 बीपीएस) की भी हो सकती है. लेकिन राजन ने कुछ कड़ी टिप्पणियां करके संतोष किया और ब्याज दरों में कोई वृद्धि नहीं की. उन्होंने रेपो दर और रिवर्स रेपो दर को जस का तस छोड़ दिया. उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि मौजूदा महंगाई दर काफी ऊंची है, लेकिन इसे लेकर अभी काफी अनिश्चितता है.
लिहाजा वे इस पर कुछ इंतजार करेंगे, लेकिन सतर्क रहेंगे. अगर खाद्य महंगाई में कमी नहीं आयी और इसके चलते महंगाई दर में कमी नहीं आयी, तो आरबीआइ अगली नीतिगत समीक्षा से पहले भी कदम उठा सकता है.
शेयर बाजार ने आरबीआइ के इस फैसले से बड़ी राहत महसूस की है. यह फैसला आने से ठीक पहले करीब 11 बजे निफ्टी 6170 के पास घूम रहा था, जो उछल कर 6236 तक चला गया. इससे पहले बुधवार सुबह में निफ्टी ने 6130 का निचला स्तर भी देखा था, जो पिछले दिन मंगलवार के निचले स्तर 6133 के पास ही था.
यह दिलचस्प है कि निफ्टी ने सोमवार के बेहद छोटे दायरे में सिमटे कारोबार के बाद मंगलवार को कुछ ज्यादा बड़ा दायरा बनाया और बुधवार का दायरा मंगलवार से भी कुछ बड़ा है. यह संकेत हो सकता है कि बाजार किसी नयी बड़ी चाल के लिए खुद को तैयार कर रहा है. यह नयी चाल अब फेडरल रिजर्व के फैसले के बाद आ सकती है.
आरबीआइ की महत्वपूर्ण नीतिगत समीक्षा से पहले बाजार अपने खास समर्थन स्तर 6140 पर आ कर बैठ गया था-एक तरह से दहलीज पर. यह कह रहा था कि घोषणा पसंद आयी, तो यहीं से संभलने के लिए तैयार हूं, वरना टूटने के लिए भी तैयार! आरबीआइ ने तो बाजार को संभाल दिया, मगर अब फेडरल रिजर्व की एफओएमसी बैठक पर नजर जमेगी.
लेकिन अंदेशा है कि आरबीआइ के ताजा फैसले से बाजार को जो राहत मिली है, वह अस्थायी हो सकती है. रघुराम राजन ने साफ तौर पर कह दिया है कि दिसंबर महीने में महंगाई दर के आंकड़े कैसे आते हैं, उस पर ही आरबीआइ का अगला कदम निर्भर होगा. उनकी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि नवंबर के आखिरी हफ्ते में मंडियों में सब्जियों के दाम घटे हैं.
लेकिन क्या दिसंबर में खाद्य महंगाई में पर्याप्त कमी हो सकेगी? अगर ऐसा होता है, तो आरबीआइ शायद आगे भी बाजार को राहत दे दे. लेकिन अगर दिसंबर में महंगाई के आंकड़े नरम नहीं पड़े, तो ब्याज दरों में वृद्धि का जो फैसला अभी टाला गया है, उसे जनवरी में लिया जा सकता है. शायद अगली नीतिगत समीक्षा से पहले ही.
एक सीधा सवाल है कि क्या आरबीआइ की ब्याज दरें बढ़ने से दूध सस्ता हो जायेगा, अनाज के दाम घट सकेंगे और मंडी में फल-सब्जियां 3-4 साल पुराने भावों पर लौट सकेंगी? जो आलू 8-10 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर मिल रहा था, वह आरबीआइ की सारी कड़क नीतियों के बावजूद कभी 20 तो कभी 30 रुपये किलोग्राम के भाव पर बिक रहा है. हरी सब्जियों के दाम तो ठेलेवाले भी अब किलो में बताने के बजाय एक पाव का भाव बताने लगे हैं.
जब वे किसी सब्जी का दाम 10 रुपये पाव यानी 40 रुपये किलो बताते हैं, तो जरा राहत महसूस होती है कि अरे, ये जरा सस्ती हो गयी! अगर ब्याज दरें बढ़ने से चीजों के दाम घटते हैं, तो क्या आरबीआइ ऐसा कोई चार्ट बना कर दिखा सकता है कि उसने जैसे-जैसे दरें बढ़ायीं वैसे-वैसे महंगाई घटती गयी. पर बीते कुछ वर्षो में ऐसा कोई रुझान दिखाया जा सकता है, इस पर संदेह है.
केवल अनाज, फल-सब्जियों और दूध के दाम तक मामला सीमित नहीं है. जो मकान-मालिक हर 11 महीने पर 10 प्रतिशत किराया बढ़ाता है, उसकी वृद्धि क्या आरबीआइ की ब्याज दरों में वृद्धि से रुक जायेगी या धीमी हो जायेगी? क्या ब्याज दरें बढ़ने से बस-ऑटो के किराये घट जायेंगे? क्या बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूलों की फीस इससे घट सकेगी? एक आदमी की जेब जिन सारी मदों में हल्की होती रहती है, उनमें से कहां ब्याज दर में वृद्धि से राहत मिल सकती है, यह कहीं दिख नहीं रहा है.
उसे केवल एक बात का संतोष हो सकता है कि चलो बैंक में जमा पैसों पर उसे थोड़ा ज्यादा ब्याज मिल सकता है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वह बचत कर कुछ पैसे बैंक में जमा कर सके. भीषण महंगाई की मार से त्रस्त आम आदमी क्या अब बचत कर पा रहा है?
दूसरी ओर ऊंची ब्याज दरों के चलते उसकी आमदनी पर चोट पड़ चुकी है या आगे पड़ने की पूरी आशंका बनती है. भारत की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) करीब एक दशक के निचले स्तर पर है. जुलाई-सितंबर 2013 यानी इस कारोबारी साल की दूसरी तिमाही में विकास दर 4.8 प्रतिशत रही और इस तरह लगातार चौथी तिमाही में विकास दर 5 प्रतिशत के नीचे आयी.
घटती विकास दर के चलते नया निवेश रुक जाता है, नयी नौकरियां नहीं आ पातीं, और काफी लोगों की नौकरियां छूट जाती हैं. जिनकी नौकरी बची रहे, उनके लिए भी वेतन-वृद्धि की संभावना कम हो जाती है और कुछ मामलों में तो वेतन घटने की भी नौबत आ जाती है. व्यवसायियों का धंधा मंदा हो जाता है.
यह एक जाना-समझा तथ्य है कि आरबीआइ की नीतिगत ब्याज दरें बढ़ने से पूरी बैंकिंग व्यवस्था में ब्याज दरें बढ़ती हैं और आर्थिक विकास दर पर उसका नकारात्मक असर होता है. यानी ब्याज दरें बढ़ने से एक आम आदमी के खर्चो में कमी की उम्मीद तो पूरी होती नहीं, क्योंकि महंगाई घटती नहीं.
बीते कई वर्षो से आरबीआइ ब्याज दरें बढ़ाते रहने और काफी ऊंचे स्तरों पर बनाये रख कर भी महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर पाया है. दूसरी ओर आरबीआइ के ऐसे कदम से उसकी कमाई पर जरूर चोट पड़ जाती है. यानी आरबीआइ जिस बीमारी के इलाज के लिए ऊंची ब्याज दरों की दवा देता रहा है, वह बीमारी तो दूर होती नहीं. मगर उस दवा के दुष्प्रभाव मरीज को भारी पड़ जाते हैं. किससे पूछा जाये कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के राज में ऐसी विडंबना क्यों है?
