।। नियामिका वर्मा।।
(महिला-अधिकार आंदोलन से संबद्ध अधिवक्ता)
एक साल पहले 16 दिसंबर को दिल्ली में एक घटना घटी. यह तारीख और उससे जुड़ी घटना आजाद भारत के भीतर महिला-अधिकारों की लड़ाई में मील का पत्थर बन कर मंजूर हुई. सड़कें थम गयीं, संसद हतप्रभ हुई और देखते-देखते यह घटना देश की चौहद्दी से बाहर निकल अंतरराष्ट्रीय जगत में मीडिया की सुर्खी बन गयी. ‘निर्भया’ या ‘दामिनी’ के रूप में एक नाम अचानक मौजूदा भारत में महिलाओं की मजबूरी-मजबूती के एक विरोधाभासी प्रतीक में ढल गया है. इस प्रतीक से आवेग भरे विचारों की अग्निशिखाएं फूट रही हैं. 21वीं सदी के अगले मुकामों की ओर बढ़ते भारत का जीवन-परिवेश, भारत की सड़कें, चौराहे, घर, दफ्तर क्या किसी महिला को नागरिक मानने के लिए तैयार हैं? एक महिला की प्राथमिक पहचान क्या है? क्या वह उद्योग और संस्कृति की चौहद्दी के भीतर उपभोग की कामनाओं के साथ स्वीकार की गयी मात्र एक काया है, या शेष आबादी के समान एक स्वतंत्रचेता और अपने भाग्य की आप विधाता एक स्वतंत्र व्यक्ति इकाई है? नारीवादी आंदोलन के सामने ये प्रश्न हमेशा से रहे हैं, लेकिन निर्भया मामले के बाद इनका स्वर कहीं ज्यादा तीखेपन के साथ महसूस हुआ.
घटना के बाद कहने को बहुत कुछ बदला. नामी न्यायाधीश की अगुवाई में समिति बनी. कानूनों की परीक्षा हुई और समाधान के तौर पर उसे और कड़ा बनाने की कारगर कोशिशें की गयीं. कई राज्यों ने महिलाओं की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बताते हुए फौरी तौर पर कुछ कदम उठाये. करोड़ों रुपये महिला सुरक्षा कोष बनाने के लिए आबंटित हुए. तो, क्या मान लिया जाये कि जिस हताशा ने पिछले साल दिल्ली की सड़कों पर एक बड़े जनाक्रोश को जन्म दिया था, उस हताशा का कारगर समाधान हो गया? विधान बनानेवालों के अतिरिक्त ऐसा शायद ही कोई माने, क्योंकि नये जान पड़ते इन कदमों के बावजूद शायद ही कोई दिन गुजरा हो जब अखबारों में गैंगरेप की कोई खबर न छपी हो. खबरें कहती हैं कि बलात्कारी स्त्री के भीतर सिर्फ एक देह देखते हैं, यह देह किसी भी उम्र, विचार, हैसियत की स्त्री की हो सकती है. यदि ऐसा न होता, तो पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार की जघन्य घटना क्यों होती?
कोई भी कानून, कैसा भी दंड बलात्कार की घटना को रोक पाने में कारगर नहीं हो पा रहा. विरोध-प्रदर्शन होते हैं, सभा-सेमिनारों में लैंगिक भेदभाव की पहचान और समाधान के बारीक नुक्ते बताये जाते हैं, लेकिन सड़क पर गुजरती हुई स्त्री अपने पक्ष में कोई बदलाव नहीं महसूस कर पाती. यदि यह सही है कि व्यवस्था ही व्यक्ति की रचना करती है, तो फिर हमें समाधान की तलाश व्यवस्था के हर पक्ष से करनी होगी. कानून और उस महिला की सुरक्षा के लिए सड़क पर गश्त करते कमांडो बाहरी व्यवस्था हैं. हमें अपने मन के भीतर झांकना होगा, मन को गढ़ने में जो ताकतें सबसे ज्यादा निर्णायक साबित होती हैं, उनको परखना होगा. अगर व्यक्ति का मानस उसके बालपन के अनुभवों की देन है, तो फिर बलात्कारी-मानस के निर्माण के तत्व बालपन में भी ढूंढ़े जाने चाहिए.
परिवार में पीड़ित होती मां बच्चे के भीतर असुरक्षा की जटिल ग्रंथियां तैयार करती है. परिवार की सत्ता-संरचना के भीतर मां की हैसियत भावी जीवन में बच्चे का भविष्य तय करती है. ‘बलात्कारियों को फांसी दो’ का नारा अपनी जगह दुरुस्त हो सकता है, पर इससे पहले हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम परिवार में मां की हैसियत ऐसी बना पाये हैं कि बच्चे की नजर में उसकी छवि श्रद्धा, आदर और अनुकरण के आदर्श पात्र के रूप में बन सके. परिवार के पुरुषों के हाथ पिटती, खुद को श्रेष्ठ समझनेवाले नाते-रिश्तों के ताने सहती एक स्त्री क्या परिवार की वंश-बेल के लिए सचमुच अनुकरण का आदर्श पात्र हो सकती है? अगर नहीं तो फिर सोचना चाहिए कि परिवार के भीतर अबला बन कर रह रही स्त्री बच्चों के भीतर आत्महीनता के कितनी छवियां रचती है.
अपमानित होती मां से परिवार की छोटी बच्ची के मन पर अपने भावी जीवन के लिए क्या अक्स उभरते हैं और पीड़ा पाकर भी जीने को मजबूर मां को देख कर परिवार का नन्हा लड़का स्त्री के बारे में अपने मन पर कौन-सी छवि अंकित करता है- यह कहना शोध का विषय नहीं. पीड़ा को अपनी नियति मान कर स्वीकार करती या फिर उसके विरोध में उठ खड़ी होती स्त्री अगर अपनी मां की ही अनुकृति होती है, तो फिर इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा जा सकता है कि किसी बलात्कारी का मानस आत्महीनता की पारिवारिक छवियों को नकारने-स्वीकारने के द्वंद्व से ही बनता है. उसके आक्रामकता का उत्स उसके पारिवारिक परिवेश में होता है, उस पारिवारिक परिवेश में जो पितृसत्ता को नियामक मान कर चलता है. इसलिए, बलात्कार के समाधान के तौर पर विधायी और प्रशासनिक सुधारों से बहुत पहले हमें यह सोचना होगा कि एक आदर्श परिवार की कौन-सी छवि हमारे मन-मानस में है.
