लातेहार जिले में एनएच 75 पर एक सप्ताह में दो बार नक्सलियों ने विस्फोट किया और पुलिस को उड़ाने का प्रयास किया. बुधवार को पुलिस के एक पूर्व सीनियर अधिकारी को छोड़ कर आ रही एस्कार्ट पार्टी को निशाना बनाने का प्रयास किया गया. यह सही है कि नक्सलियों के निशाने पर पुलिसकर्मी रहते हैं, पर मौका मिलने पर नेता को भी नहीं छोड़ते.
अब खबर है कि पुलिस ने पलामू के नेताओं को कह दिया है कि वे एनएच 75 से लातेहार जिले में न गुजरें. यह कैसा सुझाव है? कैसी चेतावनी है? रांची राजधानी है और पलामू, गढ़वा, लातेहार से आनेवाले राजनेताओं के लिए रांची आने का एकमात्र रास्ता है. अगर इन नेताओं को एनएच 75 पर चलने के लिए मना किया जाता है तो ये रांची से कट जायेंगे. जो स्थिति लातेहार की है, लगभग वही स्थिति राज्य के कई जिलों की है. राज्य का बड़ा हिस्सा नक्सली प्रभावित है. जोखिम तो हर जगह है. अगर प्रशासन ही नेताओं को यह कहने लगे कि उस रास्ते से नहीं जाना है तो इससे आतंक और बढ़ेगा. विधानसभा का सत्र शुरू होनेवाला है. ऐसे में पलामू प्रमंडल के विधायक कैसे विधानसभा आयेंगे.
किसी रास्ते से नहीं चलने का सुझाव देना ही गलत है. पलामू में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है. उनका काम सुरक्षा देना है. यह पुलिस का काम है कि वह लोगों की, नेताओं की सुरक्षा करे. किसी रास्ते से नहीं जाने का सुझाव देना अपनी जिम्मेवारी से भागना है. नेता जनप्रतिनिधि हैं. उन्हें तो दूरदराज के इलाकों में भी जाना पड़ता है. अगर एनएच पर यह हाल है तो जंगली इलाकों में क्या हाल होगा. अगर विधायक-सांसद ही डरने लगे, इलाके में न जायें तो वे जनता से कट जायेंगे. हां, उन्हें सुरक्षा देने का काम पुलिसकर्मियों का है. पलामू पुलिस को यह खुफिया तंत्र मजबूत करना चाहिए, चौकसी कड़ी करनी चाहिए ताकि विस्फोट की घटना नहीं घटे. बेहतर तकनीक का उपयोग कर यह पता लगाना चाहिए कि किस रोड में बारूदी सुरंग है. उसे खोजना चाहिए, नष्ट करना चाहिए. रास्ता पर नहीं चलने से समस्या का समाधान नहीं होनेवाला. बेहतर होगा कि पुलिस अपनी सक्रियता बढ़ाये और खौफ फैलानेवाला बयान न दे. ऐसा बयान देकर पुलिस खुद कटघरे में खड़ी हो गयी है.
