झूम खेती का जिक्र स्कूल की भूगोल की किताबों में मिलता है. यह जानकारी, कि खेती के इस आदिम रूप का इस्तेमाल भारत में न सिर्फ आज भी हो रहा है, बल्कि उत्तर-पूर्व के एक राज्य में यह चुनाव का बेहद अहम मुद्दा भी था, आपको हैरान कर सकती है. जी हां, मिजोरम में झूम खेती इस बार के चुनाव में प्रमुख मुद्दा था. माना जा रहा है कि झूम खेती पर रोक लगानेवाली योजना के बल पर ही राज्य की कांग्रेस सरकार अपनी कुर्सी बचाने में सफल रही. लेकिन, चुनावी मौसम में भी मिजोरम में छाये इस मुद्दे की चर्चा कहीं नहीं सुनी गयी.
हिंदीभाषी चार राज्यों में मतदाताओं के मूड को भांपने के लिए कम-से-कम दर्जन भर जनमत सर्वेक्षण कराये गये. चुनाव परिणाम ही नहीं, एक्जिट पोल के परिणामों को भी ‘बड़ी बहस’ का मसला बनाया गया. लेकिन, मिजोरम में लोकतंत्र का पर्व मीडिया की नजरों से ओझल रहा. कारण बताया गया कि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से मिजोरम बहुत छोटा और महत्वहीन है, इसलिए वहां जनमत सर्वेक्षण या एक्जिट पोल कराना लाभकारी नहीं है. व्यावसायिक समझ से यह तर्क सही हो सकता है, लेकिन यह कहना कि मिजोरम के चुनाव परिणाम राष्ट्रीय महत्व के नहीं हैं, राष्ट्र की हमारी समझ पर सवालिया निशान लगाता है.
यह एक कड़वी सच्चई है कि हमारे आचरण में उत्तर-पूर्व के सात राज्यों के साथ नातेदारी शायद ही कभी झलकती है. हम भले ही उत्तर पूर्व को भारत के नक्शे का सुंदर हिस्सा या सात बहनें मानते हों, लेकिन वह हमारी चेतना का हिस्सा बनने से दूर, हमसे अलग-थलग रह जाता है. ऐसे में आश्चर्य नहीं कि अलगाववादियों की धमकियों को धता बता कर लोकतंत्र में भागीदारी करने का मिजोरमवासियों का उत्साह, जो एक बार फिर 80 फीसदी के पार मतदान के रूप में जाहिर हुआ, हममें कोई विशेष उत्सुकता नहीं जगा पाता. राष्ट्र, बाजार नहीं है.
बाजार की दृष्टि फायदे की दृष्टि होती है. वह उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता को देखता है. राष्ट्र के विचार को सिर्फ केंद्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकनेवाले राज्यों तक सीमित करना संकुचित सोच का ही प्रमाण माना जायेगा. अच्छा होता अगर मिजोरम के चुनाव परिणामों के बहाने हम हाशिये पर पड़े भूगोल और सभ्यता की आवाज को सुनने की कोशिश करते.
