पिछले कई दिनों से महिलाओं के प्रति अत्याचार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. समाचार पत्रों के प्रमुख शीर्षकों में ये दर्द की कहानियां हमें व्यथित और लज्जित करती हैं. कहीं एक ही परिवार की पांच बच्चियों की हत्या कर दी जाती है, कभी पत्नी, बेटी को मार डालने, काटने जैसी नृशंस घटनाएं सामने आती हैं.
महिलाओं के प्रति अमानवीयता की सारी सीमाएं लांघी जाती हैं. हम 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाने की तैयारियां कर रहे हैं. भाषणों, सेमिनारों और कवि सम्मेलनों के माध्यम से बच्चों, महिलाओं के प्रति संवेदनाओं की भरमार होगी, उनके हक और अधिकारों की बातें की जाएंगी, लेकिन इन कुकृत्यों की शिकार हुई महिलाएं क्या मानवता के दायरे में नहीं आतीं? क्या हम आदिम युग की ओर अग्रसर हैं? जहां ज्ञान, करु णा का सूरज अनीति के अंधेरों में दम तोड़ता दिखाई देता है.
पद्मा मिश्र, जमशेदपुर
