अयोध्या की शांति को कैसे देखें ?
।। कृष्ण प्रताप सिंह।।... (वरिष्ठ पत्रकार) शहर फैजाबाद में सांप्रदायिक सद्भाव को क्षति पहुंचानेवाली कई घटनाओं के बावजूद राम जन्मभूमि/ बाबरी मसजिद विवाद की केंद्र अयोध्या में शांति की उम्र लंबी होती जा रही है. छह दिसंबर, 1992 को हुए दुर्भाग्यपूर्ण ध्वंस की बरसी पर विजय दिवस अथवा शोक दिवस के रस्मी आयोजन भी इस […]
।। कृष्ण प्रताप सिंह।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
शहर फैजाबाद में सांप्रदायिक सद्भाव को क्षति पहुंचानेवाली कई घटनाओं के बावजूद राम जन्मभूमि/ बाबरी मसजिद विवाद की केंद्र अयोध्या में शांति की उम्र लंबी होती जा रही है. छह दिसंबर, 1992 को हुए दुर्भाग्यपूर्ण ध्वंस की बरसी पर विजय दिवस अथवा शोक दिवस के रस्मी आयोजन भी इस शांति को भंग नहीं कर पाते और लोगों को सहूलियत हासिल है कि वे विवाद से जुड़े अप्रिय सवालों का सामना कर सकें. ऐसा ही एक सवाल है कि मंडल और कमंडल की शक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी, तो अयोध्या में ‘वहीं मंदिर निर्माण’ के नाम पर 1990 और 1992 में जिन उद्वेलनों को चरम पर पहुंचाया गया, उनसे किसको ज्यादा लाभ हुआ? पहले किसी से पूछिये, तो वह चुप रह जाता था, लेकिन अब फौरन बताता है : उस भूूमंडलीकरण को, जिसने राजीव गांधी की नयी आर्थिक नीतियों के प्रतिरोध को पटरी से उतारने के लिए हमें पहले मंडल-कमंडल की लड़ाई में उलझाया, फिर मंदिर-मसजिद बनाने के लिए झगड़ता छोड़ कर पूंजी को ब्रrा और मुनाफे को मोक्ष बनाने में लग गया!
अयोध्या की शांति को ठीक से समझना है, तो इस तथ्य को भी ठीक से समझना होगा कि भूमंडलीकरण की ‘सफलता’ ने देश में एक ऐसा बड़ा मध्यवर्ग खड़ा कर दिया है, जो अपने मूल चरित्र में अतिआत्ममुग्ध, ‘आप-आप ही चरे’ की प्रवृत्ति का शिकार और अपने ही ऐश्वर्य के लिए चिंतित है. यह वर्ग अपनी उपलब्धियों में न किसी को हिस्सेदार बनाना चाहता है, न ही उनके आड़े आनेवाली किसी अशांति से ‘डिस्टर्व’ होना चाहता है. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अशांति किसी श्रमिक असंतोष की उपज है, किसी आर्थिक सामाजिक बदलाव की आहट देती है, किसी लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक उथल-पुथल की परिचायक है या अयोध्या जैसे किसी संकीर्ण सांप्रदायिक उबाल से निकल कर आयी है.
भूमंडलीकरण की सफलता की श्रृंखला उस निचले वर्ग तक भी जाती है, जिसके पारंपरिक कला-कौशलों, जीवनशैलियों, रोजगारों, जीविका के अवसरों वगैरह को आक्रांत करके उसे इतनी असुरक्षाओं, अविश्वासों और अंधेरों की ओर ठेल दिया, साथ ही इतना एकाकी व अलग-थलग कर दिया गया है कि उसके लिए न अपना असंतोष व्यक्त करने का कोई मंच बचा है, न ही उससे कोई सार्थक सामूहिक हस्तक्षेप संभव हो पा रहा है. जिस राज्य को इस वर्ग ने अपना विश्वास सौंपा हुआ है, नौकरशाही और सशस्त्रबल ही उसके उपकरण दिखते हैं. सरकारें व राजनीतिक पार्टियां शोभा की वस्तु हो गयी हैं और उनके चेहरे इतने गड्ड-मड्ड कि कोई सार्थक चुनाव या राज्य की व्यवस्था में दखल सपने की बात हो गयी है, जबकि मीडिया व पॉपुलर कल्चर की मार्फत सुनियोजित ढंग से एक समूची पीढ़ी को राजनीति व समाजविमुख कर दिया जा रहा है.
अयोध्या की शांति को किस रूप में देखा जाये? खासकर तब, जब उसका तकिया बहुत कुछ उस बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के रहमोकरम पर है, जो अन्यथा आसमान सिर पर उठा सकती थी, लेकिन रामलला को न हटाये जाने से लगभग संतुष्ट है. दूसरी ओर विवादियों ने हमेशा शांति-शांति रटते हुए ही विवाद को यहां तक पहुंचाया. 1992 में भूमंडलीकरण के पैरोकारों को उन उद्वेलनों से सुविधा मिली, जिनकी बिना पर उन्होंने अपनी जनविरोधी आर्थिक नीतियों का प्रतिरोध दबा कर उन्हें थोपने में सफलता पायी. अब उनका साम्राज्य स्थापित हो गया है और उद्वेलन रास नहीं आ रहे, तो वे शांति में अपनी सुविधा तलाश रहे हैं. लेकिन उनकी तलाश से जानबूझ कर अनजान लोग कहते हैं कि शांति इसलिए कायम है कि युवा अपने कैरियर की ऊंची छलांगें लगा रहे हैं और अब मंदिर-मसजिद विवाद की संकीर्णताओं में रुचि नहीं लेते.
राजनीतिक उदासीनता इतना ही नहीं कर रही कि हालात अनुकूल होने के बावजूद राजनीतिक आंदोलन या तो हो नहीं पा रहे या कर्मकांड में बदल कर असफल हो जा रहे हैं. हम एक ऐसे ‘शांतिप्रिय’ देश में रहने लगे हैं, जहां एक के बाद एक हो रहे घोटाले भी शांति भंग नहीं कर पाते. अकादमिक संस्थानों में छात्र अपनी सहपाठिनियों के साथ ‘शांतिपूर्वक’ ‘लिपस्टिक लगाओ’ गेम खेलते पाये जाने लगें, तो क्या यह उनके 1992 से आगे बढ़ने के लक्षण हैं? आगे बढ़ना तो तब कहते, जब वे उठ खड़े होते कि बहुत हुआ, चलो अब इस विवाद को हमेशा के लिए दफना दें.
शांति हमेशा अच्छी चीज नहीं होती. वह हमारी सामूहिकता के रोज-ब-रोज सिकुड़ने और प्रतिरोधों के बिखरते व चुकते जाने के संकेत दे रही हो, तब तो और भी नहीं. उथल-पुथल जीवंत लोकतंत्र का गुण होती है और शांति के किसी भी रूप के लिए उसे अवगुण में तब्दील नहीं किया जा सकता. मुर्दा शांति से तो वह अशांति ही बेहतर है, जो अपनी समस्याओं के प्रति उदासीन होने या दुश्मन की सुविधा के मद्देनजर उद्वेलित व शांत होने की आदत से देश का पीछा छुड़ाये.
