भारत का राजकोषीय घाटा चिंताजनक स्तर पर बना हुआ है. राजकोषीय मोरचे पर नकारात्मक स्थिति को देश की अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ने का पैमाना तो माना ही जाता है, इससे इस बात का खतरा भी पैदा होता है कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की निवेश रेटिंग को एक पायदान और नीचे कर दें. इस हालात से बचने के लिए भारत का केंद्रीय वित्त मंत्रालय पिछले कुछ समय से विभिन्न कदम उठा रहा है.
लेकिन, जब आर्थिक विवेक के तहत केंद्र सरकार राजनीतिक रूप से गंभीर असर डालनेवाली सामाजिक योजनाओं के खर्चे में कतर-ब्योंत करने पर मजबूर होती दिखे, तो स्थिति की संजीदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है. केंद्रीय वित्त मंत्रलय ने इस दिशा में पहल करते हुए यूपीए सरकार के मनरेगा जैसे फ्लैगशिप कार्यक्रमों का बजट कम करने का प्रस्ताव दिया है. ऐसा राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.8 फीसदी के भीतर रखने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किया गया है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम हर हाल में ऐसी स्थिति को टालना चाहते हैं, क्योंकि यह भारत को भारी ब्याज दर के कुचक्र में डाल देगा. यह प्रस्तावित कदम नजदीक आ रहे चुनावों के मद्देनजर साहसी कहा जा सकता है.
सवाल है कि आखिर सरकार को चुनावी वर्ष में ही ऐसा जोखिम उठाने को क्यों मजबूर होना पड़ा है? क्या यह इस बात का सबूत न माना जाये कि यूपीए सरकार के नौ साल से ज्यादा के कार्यकाल के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था का प्रबंधन कुशलता के साथ नहीं किया गया? यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि यूपीए सरकार इन जन-केंद्रित कार्यक्रमों की शुरुआत एनडीए सरकार से विरासत में मिली सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के बल पर ही कर सकी थी.
यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिर तक अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत स्पष्ट हो चुके हैं. हालांकि, आरबीआइ गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और किसी किस्म की घबराहट की जरूरत नहीं है. लेकिन, केंद्रीय वित्त मंत्रलय की पहल कुछ और ही इशारा करती दिख रही है. चुनावी वर्ष में अगर कोई सरकार राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित की जगह आर्थिक औचित्य को तरजीह देती दिखे, तो इसे संकट के बादल गहराने का ही प्रमाण माना जा सकता है.
