जटिल नियमों से बढ़ती रिश्वतखोरी

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का प्रमाण–पत्र बनवाने में पहले खूब धांधलियां होती थी. आये दिन अखबारों में इस पर खबरें पढ़ने को मिलती थीं. तब जाकर इससे संबंधित नियम–कानून कड़े किये गये. पहले किसी जन–प्रतिनिधि के हस्ताक्षर से काम चल जाता था, फिर राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर और कुछ गवाही से प्रमाण–पत्र बन जाते […]

अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र बनवाने में पहले खूब धांधलियां होती थी. आये दिन अखबारों में इस पर खबरें पढ़ने को मिलती थीं. तब जाकर इससे संबंधित नियमकानून कड़े किये गये.

पहले किसी जनप्रतिनिधि के हस्ताक्षर से काम चल जाता था, फिर राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर और कुछ गवाही से प्रमाणपत्र बन जाते थे. लेकिन अब नये नियम के अनुसार, दो या तीन राजपत्रित अधिकारियों के सर्विस कार्ड की फोटोकॉपी हस्ताक्षर सहित आवेदन पत्र के साथ संलग्न करनी पड़ती है.

इसके बाद भी अगर जांच में कुछ गड़बड़ी पायी जाती है, तो प्रमाणपत्र अधर में लटक जाता है. कानून के इस पेच से वाजिब लोग भी मायूस हो रहे हैं और यहीं से उनके लिए भ्रष्टाचार का रास्ता खुल जाता है. लोग अपना काम निकालने के लिए बड़े अफसर से लेकर सामान्य कर्मचारी तक की जेबें गरम करने लगे हैं.

श्रीचरण, मेल से

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >