नारों के बीज से वोटों की फसल

।। राजेंद्र तिवारी ।। कारपोरेट संपादक प्रभात खबर राज कपूर की एक फिल्म है ‘फिर सुबह होगी’. इसमें साहिर लुधियानवी की लिखी नज्म है ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ जिसे मुकेश ने स्वर दिया है. जितनी बार भी यह नज्म सुनी, यह तय नहीं कर पाया कि यह हताशा का गीत है या उम्मीद का. […]

।। राजेंद्र तिवारी ।।

कारपोरेट संपादक

प्रभात खबर

राज कपूर की एक फिल्म है फिर सुबह होगी. इसमें साहिर लुधियानवी की लिखी नज्म है वो सुबह कभी तो आयेगी जिसे मुकेश ने स्वर दिया है. जितनी बार भी यह नज्म सुनी, यह तय नहीं कर पाया कि यह हताशा का गीत है या उम्मीद का.

चुनाव का माहौल हर जगह तारी है और तमाम नेताओं के भाषण, आरोपप्रत्यारोप, भूखों को रोटी देने का वादा और पैसेवालों को और पैसे की गुंजाइश देने का वादा, पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात, महंगाई मिटा देने और खुशहाली ला देने के नारे. 1947 में नियति के साथ किया गया वादा, हर नारे में, हर नेता के पैरों के नीचे कुचला हुआ ही नजर आता है.

यह हमारे स्वतंत्र भारत के साथ किया हुआ पहला वादा था. यह वादा काफी लंबा चला, लेकिन फिर वादों की फैक्ट्रियां नेताओं के यहां उग आयीं और वादों के बीज बोकर वोटों की फसल काटने का हुनर सबसे कामयाब नुस्खा बन गया सत्ता की राजनीति का.

मुझे याद आता है कि 70 के दशक में एक नारा आया थागरीबी हटाओ. एक निगेटिव नारा भीजनसंघ के दीये में तेल नहीं, सरकार बदलना खेल नहीं. चुनाव जीता गया, गरीबी हटाओ का नारा पीछे चला गया और मिली इमरजेंसी. इमरजेंसी में जो नारे आये, उनमें से प्रमुख थे दूरदृष्टि, कड़ी मेहनत, पक्का इरादा, अनुशासन ही देश को महान बनाता है, हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं.

जिस बस से स्कूल जाता था, उस पर ये नारे लिखे हुए थे. लेकिन इन नारों के बीच संपूर्ण क्रांति का नारा ऐसा चला कि सरकार बदल गयी और संपूर्ण क्रांति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी जिन पर थी, वे सत्ता में गये. लेकिन फिर वही हुआ.

सत्ता के नीचे यह नारा दब गया. जात पर पांत पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर.. नारा यह उछाला और जातपांतधर्म सब को अपने इस नारे के बीज पर खाद की तरह छिड़कना शुरू कर दिया गया. सत्ता की फसल काटी और इस फसल ने भविष्य की नयी इबारत भी लिख दी.

फिर नारे उछले भ्रष्टाचार को खत्म करने के और राम जन्मभूमि के.. बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का. जय सियाराम और रामराम जैसे अभिवादन गायब होने लगे और गया जय श्रीराम. सत्ता के बाद ये सब भी गायब हो गये. नारों के बीज बोने और वोटों की फसल काटने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है.

फर्क इतना आया है कि अब किसी को भूखे मरने देंगे जैसे नारे एक बड़े तबके को छूते ही नहीं. अब बात विकास की है. अब बात शाहजादे की है, अब बात अलबर्ट पिंटो को गुस्सा आने की है. हो भी क्यों ! अब एक मजबूत केंद्रक बन गया है जो समाजिक वृत्त की परिधि से लंबी दूरी पर है. ये ही लोग सब चलाते हैं. इसलिए इनके भले में ही देश का भला है, लिहाजा इनके भले के नारे बनने लगे.

परिधि से जो कुछ गिनेचुने लोग येनकेनप्रकारेण ट्रैवल करके शहरी केंद्रक में रहे हैं, उनकी सक्सेस स्टोरीज पेश की जा रही हैं कि देखो विकास हो रहा है. ये लोग भी समझते हैं कि वाकई विकास हो रहा है. पिछले दिनों रांची में अपने दफ्तर के पास की गुमटी में चाय पी रहा था, तभी राजनीति की बात चल निकली. गुमटीवाले ने कहा कि सब गड़बड़ हो गया है, विकास रुक गया है, यह सरकार कुछ अच्छा नहीं कर रही.

महंगाई देखो कितनी बढ़ गयी. हमने उससे पूछाये बताओ कि पिछले दस साल में आपकी स्थिति सुधरी है कि खराब हुई है? गुमटीवाले ने कहा कि हमारी स्थिति सुधरी है. हमारे साथी ने दूसरा सवाल किया कि जब आपकी स्थिति सुधरी है तो फिर सब गड़बड़ कैसे हो रहा है? उसने कहा कि देखो प्याज कितना महंगा हो गया है.

वाजपेयी जी के समय में एक बार प्याज 80 रु पये पर पहुंच गया था, तब कितना हल्ला मचा था. लेकिन आज प्याज महंगा हो रहा है, तो कोई हल्ला ही नहीं मचा रहा. वह बोला, दिल्ली की सरकार बड़ी निकम्मी है. हमारे एक साथी ने कहा कि यदि गड़बड़ रुक जायेगी, तो आपकी यह गुमटी भी हट जायेगी, क्योंकि यह गैरकानूनी तरीके से सरकारी फुटपाथ पर बनी हुई है.

वह बोलाकुछ भी हो, यह सरकार बहुत गड़बड़ है. गैस के सिलिंडर के साथ कितने झंझट लगा दिये. अरे सब्सिडी खत्म करो. जिसे लेना होगा, लेगा. चीनी पर भी तो सब्सिडी खत्म हो गयी, फिर भी लोग खा रहे हैं ! ..आप समझ गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं. थोड़ासा दिमाग पर जोर डालेंगे, सब साफ हो जायेगा.

और अंत में.

साहिर लुधियानवी की जिस नज्म का जिक्र मैंने शुरुआत में किया है, वही नज्म पेशखिदमत है. पढ़िए और सोचिए

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा

जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा

जब अंबर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुगजुग से हम सब मरमर के जीते हैं

जिस सुबह के अमृत की धुन में हम जहर के प्याले पीते हैं

इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं

मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं

इंसानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में तोली जायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को ना बेचा जायेगा

चाहत को ना कुचला जायेगा, इज्जत को बेचा जायेगा

अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्मायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर ये भूख के और बेकारी के

टूटेंगे कभी तो बुत आखिर दौलत की इजारादारी के

जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल फांकेगा

मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख मांगेगा

हक मांगने वालों को जिस दिन सूली दिखाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आयेगी

फाकों की चिताओं पर जिस दिन इंसां जलाये जायेंगे

सीने के दहकते दोजख में अरमां जलाए जायेंगे

ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनायी जायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी..

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