।।शैलेश कुमार।।
(प्रभात खबर, पटना)
अपने देश को महान कहना अच्छी बात है. लेकिन इससे भी अच्छी बात यह होगी कि देश के साथ हम भी महान बनें. सोच में, कर्म में, राजनीति में और अंतत: खुद की नजरों में. अब सवाल यह उठता है कि यह महानता आयेगी कैसे? दूसरे देशों के सामने अपना दुखड़ा रो कर? कांग्रेस द्वाराभाजपा और भाजपा द्वारा कांग्रेस पर आरोप मढ़ कर? सबके सामने साधु और पीछे भेड़िया बन कर? या फिर वोट देने के बाद पांच वर्षो तक चुपचाप बैठ कर? हममें से अधिकांश लोग शायद इस सवाल का जवाब देने में बहुत वक्त लें, क्योंकि हमारी सोच .मैं. में इतनी डूब गयी है कि हमारे पास .हमलोग. के लिए सोचने का वक्त ही नहीं रह गया है.
देश की जनसंख्या तो करोड़ों में है, लेकिन आवाज हममें से कुछ के ही गले में है. आंखें तो सब की हैं, लेकिन हकीकत को स्वीकार करने की ताकत केवल कुछ में है. आखिर हर तरफ अन्याय देखने के बावजूद जनता क्यों नहीं सड़कों पर उतरती है? यूपी के दंगों में जान-माल का भारी नुकसान हो गया, लेकिन हमने क्यों नहीं विवेक से काम लिया? आखिर क्यों अपने ही भाई-बहनों की खून के हम प्यासे हो गये? विदर्भ में किसान आत्महत्या करते रहे, राजनेता अपनी रोटी सेंकते रहे, लेकिन मरते किसानों की मदद के लिए हममें से कोई क्यों नहीं आगे आया?
एक ओर एफसीआइ के गोदामों के बाहर अनाज खुले में सड़ते रहे और दूसरी ओर उत्तरी कर्नाटक में कुपोषण से हजारों मासूम मरते रहे, फिर भी हमने आवाज क्यों नहीं उठायी? घूस दे-दे कर काम निकलवाते रहे, दबंगों से डर कर जीते रहे, लेकिन इसका जवाब देने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाये? अब आप कहेंगे कि हमने किया न! वोट डाल कर आराम से बैठ गये. काली कमाई की बहती धारा में अपना भी हाथ धोते रहे. ट्रैफिक जाम की शिकायत करते रहे, पर दोपहिया और चारपहिया गाड़ी से नीचे उतरने का नाम ही नहीं लिया. बसों में लटक कर जाते रहे, पर दो मिनट रुक कर दूसरी बस का इंतजार नहीं किया.
लोगों पर नियमों की अनदेखी का आरोप मढ़ते रहे, पर खुद ही इनका पालन करना जरूरी नहीं समझा. कुछ दिन अन्ना के अभियान में दो-चार नारे लगा लिये, तो समझ लिया कि बहुत बड़ा आंदोलन कर लिया. पर असली जीत तो तब होती न, जब यह सिलसिला बरकरार रहता. सरकार झुकती और जनता का सेवक बन कर उसके कल्याण के लिए काम करती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. आज जमाना अपनी मदद खुद करने का है. बदलाव के लिए कोई अवतार नहीं लेनेवाला. हम ही जनता हैं और हम ही अपने नेता भी. अब भी यदि आवाज नहीं उठायी और दब कर ही जीते रहे, तो कहीं के नहीं रहेंगे. हालत कुछ ऐसी होगी कि गर्त में जाते रहेंगे, लेकिन फिर भी गाते रहेंगे – सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा.
