झारखंड में प्रतिवर्ष डेंगू से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. अभी संताल परगना में ही डेंगू के सौ से अधिक मरीज पाये गये. साहिबगंज, पाकुड़ व देवघर में इसके लक्षण कुछ ज्यादा ही दिखे हैं. इनमें अधिकांश का इलाज बिहार के भागलपुर व पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में चल रहा है.
संताल परगना में डेंगू के इलाज के लिए न तो कोई व्यवस्था है, न ही इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के पास कोई योजना है. अब हालत यह है कि डेंगू पीड़ित मरीजों की संख्या के दबाव के कारण बाहर के अस्पताल भी नये मरीजों का दाखिला लेने से इनकार करने लगे हैं.
जाहिर है उनके परिजनों की यह अनकही पीड़ा अखरने लगी है, जो बेहद चिंतनीय है. यह उस राज्य की लाइव स्टोरी है, जो पिछले एक दशक में स्वास्थ्य मद में भारी राशि निवेश करने का दावा करता रहा है. सवाल है कि राज्य सरकार की इस मामले में कोई सक्रियता क्यों नहीं दिखती? क्या विभागीय दायित्व अनाप–शनाप दवाएं खरीद कर अवैध ढंग से व्यक्तिगत तिजोरी भरने तक ही सीमित है? अगर ऐसा नहीं होता, तो देवघर, दुमका व चाईबासा आदि जिलों के प्रखंड स्तरीय चिकित्सा केंद्रों में लाखों की दवाएं क्यों एक्सपायर हो गयीं? क्यों इन दवाओं को फेंक दिया गया, या फिर जला डाला गया? प्रत्येक साल खरीद–फरोख्त का ऐसा खेल राज्य में चलता है.
ठीक इसी प्रकार का गोरखधंधा चिकित्सा उपकरणों की खरीद में देखा जा रहा है. एक से एक चिकित्सा उपकरण खरीदे जा रहे हैं, लेकिन संबंधित उपकरणों को चलाने के लिए दक्ष कर्मचारी न तो भरती किये जा रहे हैं और न ही प्रशिक्षित. नतीजा, करोड़ों के उपकरणों को जंग लग चुका है. यही हाल रहा, जो आनेवालेवर्षो में इन उपकरणों को कबाड़ी में बेचना पड़ेगा.
ऐसे में गंभीरता से इस ओर कुछ करने व सोचने की जरूरत है. संताल परगना क्षेत्र में एक साधनसंपन्न बड़े अस्पताल की मांग उठती रही है. ऐसे में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से यहां के लोगों को काफी उम्मीद है. क्योंकि वह इसी क्षेत्र के दुमका से चुन कर आते हैं. जब अधिकांश निम्न आय वर्ग के लोग इसकी चपेट में आ रहे हों, तो सरकार को फौरन सक्रिय हो जाना चाहिए. अन्यथा एक कल्याणकारी राज्य की कल्पना ही बेमानी साबित होगी.
