।। गुंजेश ।।
(प्रभात खबर, रांची)
इसे शनिवार की सुबह के मौसम का जादू कहिए या संयोग, लेकिन यह हुआ. मनबिदका भैया और रुसवा साहब एक दूसरे से टकरा गये. नहीं, यह टकराना दिग्गी राजा और नरेंद्र मोदी के टकराने की तरह नहीं था. भाई, भले लोग टकराते भी हैं तो इतना फासला बना ही रहता है कि गर कभी दोस्त हो जायें तो शर्मिदा न होना पड़े.
बहरहाल, मनबिदका भैया और रुसवा साहब मिले और सुबह–सुबह मिले. बहुत दिनों के बाद जैसे नागाजरुन की कविता में कोई चूहा निकलता है, वैसे ही दोनों अपने–अपने घरों से निकले थे. दोनों के हाथ में अखबार और चेहरे पर खुशी थी.
चाय की दुकान पर छोटू ने मनबिदका भैया से पूछा–का बात है भैया, हाथ में अखबार, थोबड़े पर हंसी कोई लॉटरी लगी है का? सवाल तो मनबिदका भैया से था, लेकिन आम आदमी के लिए हर सवाल महत्वपूर्ण होता है, बल्कि उसे हर सवाल का जवाब देना होता है, तो रुसवा साहब को लगा कि यह सवाल भी उनसे ही है. उन्होंने कहा– ए छोटुवा! जरा स्पेशल चाय बनाना.
अब मोदी को पता चलेगा कि एक तुम ही नहीं हो गालिब, सुखनवर और भी हैं बहुत अच्छे. सरकार ही की आलोचना करनी है, तो कोई भी कर देगा, उसके लिए किसी नयी दृष्टि की जरूरत थोड़े ही है. ‘राइट टू रिजेक्ट मिला है छोटू’– यह मनबिदका भैया थे, ‘अब लोकतंत्र का मतलब अपनी मर्जी से अपना शोषक चुनना नहीं रह जायेगा.’
दोनों में किसी की बात छोटू के पल्ले तो नहीं पड़ी, लेकिन दोनों की बात एक दूसरे से टकरा गयी. ठीक कहते हैं चचा आप! मनबिदका भैया ने रुसवा साहब को चचा क्या कहा, वह भड़क गये. बोले– अमां यार, ठीक है रिटायर हो गये हैं, लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही है कि बूढ़े हो गये हैं.
और फिर शायरों की जात कभी बूढ़ी नहीं होती. मनबिदका भैया समझ गये और उन्होंने बात बदलते हुए कहा कि लोग कह रहे हैं, राहुल बाबा नाटक कर रहे हैं. रुसवा साहब थोड़ा शायराना होते हुए बोले, कुछ तो लोग कहेंगे.. और, अगर बिल्ली के भाग से ही छींका टूटे तो हर्ज क्या है? अगर, यह नाटक ही है, तो मोदी के लोगों ने यह नाटक पहले क्यों नहीं किया? और, फिर नाटक क्या नहीं है? अडवाणी का रुठना, मोदी का मनाना, नियुक्तियों में कटौती, वेतन में बढ़ोतरी, सब तो नाटक ही है.
लेकिन, राहुल पहले भी तो विरोध कर सकते थे?- मनबिदका भैया ने सवाल किया और साथ में जोड़ा–याद रखिए, यही एंग्री यंगमैन वाला तेवर उन्हें यूपी के चुनावों में ले डूबा था. मनबिदका भैया बोल ही रहे थे कि रुसवा साहब बोल पड़े–यार आदमी तो तुम समझदार लगते हो, पर राजनीति में समय भी काई चीज होती है या नहीं, आतंकवादी कश्मीर में कहीं भी, कभी भी हमला कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने गुरुवार का दिन ही क्यों चुना? बेटा मामला टाइमिंग का है, समझे!
