।। एमजे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
चुनावों के उत्सव में पुराने आंकड़ों की भूमिका किसी ब्यूटी क्वीन सी होती है. कुत्सित दावं-पेच इस कहानी का दूसरा पहलू होते हैं. एक, दिन की रोशनी में दिखायी जानेवाली बाजीगरी के समान है, जबकि दूसरे में कोई ओझा या तांत्रिक अमावस की रात में कब्रिस्तान में चहलकदमी करता है. भाजपा की बढ़ती चुनौती का जवाब देने के लिए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आंकड़ों को सिर के बल पलट दिया. भाजपा को अकेला नहीं महसूस करना चाहिए. चिंदबरम अपने पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी के रिकॉर्ड पर दाग लगाने के लिए भी ऐसा ही करते हैं.
यूपीए और एनडीए की तुलना करते वक्त उन्होंने हाथ की सफाई दिखाते हुए, बीच के बिंदु की तुलना बीच के बिंदु से की. इस बात का कोई संकेत दिये बगैर कि वे उत्थान की बात कर रहे हैं या पतन की. एनडीए ने विरासत में मिली कमजोर वृद्धि दर को ऊपर उठाया और उसे आठ फीसदी के आगे तक पहुंचाया. यूपीए सरकार को ऊपर चढ़ती हुई गाड़ी की स्टियरिंग मिली थी, लेकिन वह उसे नीचे उतारते हुए रसातल में ले गयी. एक मतदाता, जो अपनी हल्की होती जेब के बीच सब्जी खरीद रहा है, उसे सच मालूम है.
दावं-पेच विभाग के काम ज्यादा दुर्भावनापूर्ण हैं. यह इस उम्मीद में आरोपों को गढ़ता है कि अगर कीचड़ उछाला जाये, तो थोड़ा सा तो कहीं न कहीं चिपकेगा. लेकिन, कीचड़ उछालने से अपने हाथ भी मैले होते हैं. आज, जो हो रहा है, उसकी तुलना में यूपीए का 2009 का चुनाव अभियान साफ-सुथरेपन की एक मिसाल था. एक घबरायी और डरी हुई पार्टी ही दुश्मनों की फेहरिस्त बनाती है और कीचड़ उछालनेवालों की ब्रिगेड बनाती है. 2009 में भी यूपीए के पास चिंता करने को काफी कुछ था. परमाणु समझौते पर सरकार बचाने के लिए ‘कैश फॉर वोट’ इनमें से एक था. लेकिन, तब उसके पास एक सकारात्मक वृत्तांत भी था, जिसने युवाओं में आशा का संचार किया था. उन उम्मीदों पर आज पानी फिर गया है, जिसका चुनावी परिणाम दिन-ब-दिन स्पष्ट होता जा रहा है.
कांग्रेस के लिए जो चीज प्राणघातक साबित हो रही है, वह है संगठन में बिखराव और दिशाहीनता. प्रधानमंत्री को बार-बार विपक्ष के हाथों नहीं, अपनी ही पार्टी के कारण अपमान का घूंट पीना पड़ रहा है. दागी जन-प्रतिनिधियों से संबंधित अध्यादेश पर भ्रम और किया गया हमला एक और लेकिन चकित करनेवाला उदाहरण है. यह बाकायदा कैबिनेट का फैसला था. राहुल गांधी द्वारा अध्यादेश को ‘पूरी तरह बेतुका’ कह कर खारिज करने से पहले, चिदंबरम, सुशील शिंदे और कमलनाथ जैसे सरकार के दिग्गज इस पर सहमति जता चुके थे. राहुल की भाषा थोड़ी ताकत के गुमान से भरी हुई और उग्र थी. इसमें खेल के मैदान की नारेबाजी ज्यादा थी. शीर्ष स्तर की नीतियों पर बोलते वक्त बरता जानेवाला संयम इसमें कम था. जो भी हो, अगर राहुल की राय से पार्टी इत्तफाक रखती है, तो मनमोहन सिंह और उनके पूरे मंत्रिमंडल को फौरन इस्तीफा दे देना चाहिए. सत्ताधारी दल और उसके प्रधानमंत्री के बीच ऐसा युद्ध अभूतपूर्व है.
लेकिन, ऐसा शायद ही हो. कांग्रेस के रुख में आये बदलाव के पीछे सिद्धांतों से ज्यादा राजनीति का हाथ है. राहुल ने उस समय विरोध नहीं किया, जब कैबिनेट फैसला ले रही थी. उन्होंने तब विरोध किया, जब जनमत इसके खिलाफ जाने लगा और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जल्दबाजी में अध्यादेश पर दस्तखत नहीं करने का संकेत दे दिया.
लगभग एक दशक से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे शख्स के इर्द-गिर्द पड़ी विश्वसनीयता की आखिरी दीवार को ढहते देखना, शर्मिदा करनेवाला है. विदेश नीति के संबंध में उनकी दो महत्वाकांक्षी निजी पहल- एक, पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाना और दूसरा, अमेरिका के साथ संबंधों का नया दौर शुरू करना औंधे मुंह गिर गया है.
जिस तरह से कांग्रेस ने पाकिस्तान के साथ वार्ता से दूरी बना ली है, उससे प्रधानमंत्री को हैरत हो रही होगी, या कहें होनी चाहिए. अंबिका सोनी जैसी वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक तौर पर इसके प्रति अपनी नाखुशी का इजहार किया है. अगर कांग्रेस की हिट लिस्ट में नरेंद्र मोदी सबसे ऊपर हैं, तो लगता है कि दूसरे नंबर पर प्रधानमंत्री ही हैं.
प्रधानमंत्री स्थितप्रज्ञ हैं या आत्मपीड़क! विपक्ष के हमलों को झेलना राजनीति का हिस्सा है, लेकिन अपनी ही पार्टी की कटु आलोचनाओं को ङोलने के लिए, जैसे स्वभाव की जरूरत होती है, उसे समझ पाना आसान नहीं है. शायद डॉ सिंह को लगता है कि जिस नैया की पतवार उनके हाथों में है, उसे नहीं डुबाना चाहिए. लेकिन उनके ही सहयोगियों द्वारा उस नैया को तूफान में उछाला जा रहा है.
फिलहाल देश में सरकार नाम की कोई चीज बची नहीं रह गयी है. कुछ बचा है, तो बस एक बेतुकापन. जिसमें किसी मंत्री को यह नहीं पता है कि किसी मामले में उसका पक्ष क्या है, या उसका पक्ष क्या होना चाहिए? आनेवाले समय में सत्ता के नाम पर एक कागजी इमारत बची रहेगी और कांग्रेस यह उम्मीद करती रहेगी कि अभी से मार्च के बीच शायद कोई चमत्कार उसे चुनाव में पिघलने से बचा ले. चमत्कारों के होने के लिए संतों की जरूरत होती है और राजनीति में कोई संत नहीं है.
